मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने शुक्रवार को केन्द्रीय केबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को पत्र लिखकर राजस्थान में कम्पलायंस रिडक्शन एंड डीरेग्यूलेशन के दूसरे चरण की तैयारियों की जानकारी दी है। पत्र में मुख्य सचिव ने बताया कि राज्य सरकार ने जिन 28 प्राथमिकता /वैकल्पिक प्राथमिकता क्षेत्रों की पहचान की है, उनमें निवेश प्रोत्साहन ब्यूरो (बीआईपी), उच्च शिक्षा और स्कूली शिक्षा, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मण्डल, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, राजस्व, एलएसजी, यूडीएच, रीको तथा श्रम, उद्योग, पर्यटन, प्रशासनिक सुधार विभाग, ऊर्जा व खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के बिन्दु शामिल हैं। केन्द्रीय केबिनेट सचिवालय ने कम्पलायंस रिडक्शन एंड डीरेग्यूलेशन के फेज—2 के लिए 23 प्राथमिकता क्षेत्र और 5 वैकल्पिक प्राथमिकता क्षेत्र निर्धारित किए हैं।
मुख्य सचिव ने बताया कि लाइसेंस की जरूरत को कम से कम करना, विभिन्न विभागों के द्वारा जारी लाइसेंस को जहां तक हो सके, एकीकृत कर सिंगल विंडो के माध्यम से उपलब्ध करवाना, निरीक्षण को कम से कम करना, स्व-सत्यापन को बढ़ावा देना, डिजिटाइजेशन, कर-निश्चितता व निवेशकों की पहुँच बढ़ाना और मुकदमेबाजी में कमी पर ध्यान केंद्रित करते हुए व्यवसाय करने में सुगमता को बढ़ावा देना जैसे सुधार दूसरे फेज में शामिल हैं इससे विकास और प्रगति को नया आधार मिलेगा। इन सुधारों पर अध्ययन चल रहा है।
नये प्रस्तावित सुधारों में मुख्य जोर लैंड यूज से जुड़ी प्रक्रियाओं के सरलीकरण पर दिया गया करना है जिससे औद्योगिक इकाई शुरू करने में आसानी होगी, अपनी भूमि पर मकान, दुकान बनाने के लिए विभिन्न विभागों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, विभिन्न विभागों से विभिन्न स्तर की फायर सेफ्टी, बिल्डिंग निर्माण, बिजली, पेयजल, घरेलू गैस सप्लाई सम्बंधी लाइसेंस नहीं लेना होगा।
प्रस्तावित कदमों में राज्य में औद्योगिक विकास का माहौल बनाने के लिए व अफोर्डेबल हाउसिंग के लिए बिल्डिंग की ऊंचाई, सेट बैक के नियमों में शिथिलन दिया जाएगा। ‘एवरीथिंग इज परमिटेड अनटिल प्रोहिबिटेड’ सिद्धान्त को मूल बिन्दु बनाने पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत यदि कृषि भूमि का प्रस्तावित उपयोग (गैर कृषि भूमि में) मास्टर प्लान में अनुमत है तो कन्वर्जन जरूरी नहीं रह जाएगा। शहरों के विभिन्न जोन का प्लान तैयार होगा जिसमें न्यूनतम नेगेटिव लिस्ट होगी यानी आवासीय क्षेत्र में वाणिज्यिक उपयोग और वाणिज्यिक क्षेत्र में आवासीय उपयोग की प्रक्रिया आसान होगी। इससे श्रम शक्ति को अपने कार्यस्थल के आसपास ही आवास उपलब्ध होगा, ट्रैफिक और प्रदूषण से निजात भी मिलेगी।