राजस्थान सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक, ‘राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम’, एक बार फिर बड़े संकट के मुहाने पर खड़ी है। प्रदेश के निजी अस्पतालों और फार्मेसी संचालकों ने आज, 25 मार्च से ओपीडी के तहत दी जाने वाली कैशलेस दवाओं का वितरण अस्थायी रूप से बंद करने का कड़ा निर्णय लिया है। इस हड़ताल के चलते राज्य के करीब 50 लाख लाभार्थियों, जिनमें पेंशनर्स और गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीज शामिल हैं, के सामने स्वास्थ्य सेवाओं का गंभीर संकट पैदा हो गया है।
भुगतान के अभाव में चरमराई व्यवस्था—
राजस्थान एलायंस ऑफ हॉस्पिटल एसोसिएशंस के अनुसार, यह कदम मजबूरी में उठाया गया है। पिछले आठ से नौ महीनों से सरकार की ओर से अस्पतालों और फार्मेसी इकाइयों के करोड़ों रुपये के क्लेम लंबित हैं। बकाया राशि का भुगतान न होने के कारण दवा आपूर्तिकर्ताओं ने अब फार्मेसी संचालकों को उधार में दवाएं देना बंद कर दिया है। स्टॉक खत्म होने और वर्किंग कैपिटल की भारी कमी के कारण संचालकों के पास सेवाएं रोकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
पेंशनर्स और गंभीर मरीजों पर दोहरी मार—
इस गतिरोध का सबसे बुरा असर बुजुर्ग पेंशनर्स पर पड़ रहा है, जो अपनी नियमित दवाओं के लिए पूरी तरह आरजीएचएस पर निर्भर हैं। हृदय रोग, कैंसर और किडनी जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए एक दिन भी दवा न मिलना जानलेवा साबित हो सकता है। लाभार्थियों का कहना है कि वे सालों से अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा इस योजना के लिए अंशदान के रूप में देते आए हैं, लेकिन सरकारी लापरवाही के कारण उन्हें निजी जेब से महंगी दवाएं खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
निजी अस्पतालों का कड़ा रुख—
एसोसिएशंस के प्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार के साथ कई दौर की बातचीत के बावजूद केवल आश्वासन ही मिले हैं, धरातल पर भुगतान की प्रक्रिया बेहद सुस्त है। अस्पतालों का तर्क है कि वे पहले ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं और बिना भुगतान के दवाओं का वितरण जारी रखना अब उनके बस से बाहर हो चुका है। जब तक बकाया राशि का एक बड़ा हिस्सा जारी नहीं किया जाता, तब तक कैशलेस वितरण बहाल करना संभव नहीं होगा।
सरकार के सामने चुनौती—
यह संकट न केवल मरीजों के लिए परेशानी का सबब है, बल्कि राज्य सरकार की साख पर भी सवालिया निशान लगाता है। चुनावी साल या बजट सत्र के आसपास इस तरह की अव्यवस्था प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठाती है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी फिलहाल मामले को सुलझाने और बीच का रास्ता निकालने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन फार्मेसी संचालकों ने साफ कर दिया है कि इस बार वे केवल ठोस भुगतान के बाद ही हड़ताल वापस लेंगे।
फिलहाल, प्रदेश भर के लाखों कर्मचारी और पेंशनर्स टकटकी लगाए सरकार की ओर देख रहे हैं कि कब इस गतिरोध का अंत होगा और उन्हें दोबारा बिना किसी बाधा के जीवनरक्षक दवाएं मिल सकेंगी।




