Jaipur News: जेडीए किया कांड :सीकर रोड ट्रांसपोर्ट नगर के 18 भूखण्डों पर ‘डबल’ कब्जा, विधानसभा में गूंजा मामला 

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जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) की सीकर रोड स्थित बहुप्रतीक्षित ट्रांसपोर्ट नगर योजना गंभीर प्रशासनिक अनियमितताओं के चलते विवादों के घेरे में आ गई है। जेडीए की एक बड़ी मानवीय भूल के कारण योजना के 18 व्यावसायिक भूखण्डों को दो अलग-अलग व्यक्तियों या फर्मों को आवंटित कर दिया गया। इस ‘डबल अलॉटमेंट’ के खुलासे के बाद अब जेडीए प्रशासन बैकफुट पर है और अपनी गलती सुधारने की कवायद में जुटा है।

विधानसभा में सरकार ने स्वीकारी गलती—

यह मामला राजस्थान विधानसभा में उस समय चर्चा का विषय बना जब एक प्रश्न के लिखित जवाब में सरकार ने सार्वजनिक रूप से इस गड़बड़ी को स्वीकार किया। जवाब में बताया गया कि जेडीए द्वारा इन भूखण्डों के आवंटन में भारी चूक हुई है। अब विभाग ‘प्रथम आवंटी’ के अधिकार को सुरक्षित रखते हुए दूसरे आवंटी के आवंटन को निरस्त करने की कानूनी प्रक्रिया पर काम कर रहा है।

आंकड़ों का खेल: हजारों आवंटन और लटके हुए पट्टे—

सरकार द्वारा विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के लिए दो अलग-अलग चरणों में लॉटरी निकाली गई थी:

अप्रैल 2007: प्रथम लॉटरी के माध्यम से 1146 व्यावसायिक भूखण्ड आवंटित किए गए।

जनवरी 2018: दूसरी लॉटरी में 968 भूखण्डों का आवंटन हुआ।

कुल आवंटियों में से अब तक 1601 लोगों को लीज डीड (पट्टा) जारी की जा चुकी है, जिन्होंने अपनी पूरी राशि समय पर जमा करा दी थी। हालांकि, 513 मामले अभी भी अधर में लटके हुए हैं। इन मामलों में पट्टे जारी न होने के मुख्य कारणों में भुगतान में देरी, अपूर्ण दस्तावेज या प्रशासनिक अड़चनें शामिल हैं।

बैकफुट पर जेडीए, आवंटन निरस्तीकरण की तैयारी—

एक ही भूखण्ड के दो दावेदार होने से न केवल कानूनी पेंच फंस गया है, बल्कि आवंटियों के बीच भी भारी रोष है। जेडीए के अधिकारियों का कहना है कि वे इन 18 विवादित मामलों का प्राथमिकता से निपटारा कर रहे हैं। नियमतः, जिस व्यक्ति को भूखण्ड का आवंटन पहले (कालक्रम के अनुसार) हुआ था, उसी का हक बरकरार रहेगा। दूसरे पक्ष को या तो जमा राशि रिफंड की जाएगी या वैकल्पिक समाधान तलाशा जाएगा।

ट्रांसपोर्टर्स की नाराजगी और सुविधाएं—

गौरतलब है कि सीकर रोड स्थित यह ‘न्यू ट्रांसपोर्ट नगर’ लगभग 494 एकड़ में फैला है और इसमें कुल 3245 प्लॉट सृजित किए गए हैं। व्यापारियों का आरोप है कि जेडीए ने सुविधाएं विकसित किए बिना ही आवंटन निरस्त करने के नोटिस जारी करना शुरू कर दिया था, जिस पर पहले भी काफी हंगामा हो चुका है।

इस ताजा विवाद ने जेडीए की कार्यप्रणाली और डेटा प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आवंटियों का कहना है कि प्राधिकरण की इस लापरवाही की सजा उन्हें मानसिक तनाव और कानूनी लड़ाई के रूप में भुगतनी पड़ रही है।

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