JLF 2026: ‘साहित्य का महाकुंभ’ या ‘कॉर्पोरेट तमाशा’

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JLF में बौद्धिक दिवालियापन और ‘सर्कस’ जैसा माहौल देखा गया। आयोजकों के लिए यह गर्व की बात हो सकती है कि यहाँ बड़ी संख्या में लोग आए, लेकिन सच यह है कि इनमें से 80 प्रतिशत लोग केवल ‘इंस्टाग्राम रील्स’ बनाने और सेलिब्रिटीज के साथ सेल्फी लेने आए थे। सत्रों के बीच गंभीर चर्चा के दौरान भी पीछे ‘फूड स्टॉल्स’ पर शोर-शराबा और हंसी-मजाक चलता रहा। क्या यह साहित्य का उत्सव है या किसी शॉपिंग मॉल का उद्घाटन?

साहित्य के नाम पर धनी और प्रभावशाली परिवारों की तानाशाही:
आयोजक ‘समावेशिता’ की बात करते हैं, लेकिन असलियत में यह फेस्टिवल एक धनी और प्रभावशाली परिवारों का समूह बनकर रह गया है। साधारण हिंदी या क्षेत्रीय भाषा के लेखकों को हाशिए पर रखा गया है, जबकि ‘विदेशी लहजे’ वाली अंग्रेजी बोलने वाले लेखकों को पलकों पर बिठाया गया। ₹14,000 प्रति दिन वाले ‘फ्रेंड ऑफ द फेस्टिवल’ पास वालों के लिए मखमली सोफे और आम साहित्य प्रेमी के लिए कंकड़-पत्थर वाली जमीन—यही है आयोजकों का ‘लोकतंत्र’।

विचारों की जुगाली, नया कुछ भी नहीं:
विलियम डेलरिंपल और नमिता गोखले वही पुराने चेहरे और वही पुराने मुद्दे लेकर हर साल आ जाते हैं। 2026 में भी चर्चा का स्तर 2010 जैसा ही है। आयोजक नए और क्रांतिकारी विचारों को मंच देने के बजाय उन्हीं ‘स्थापित’ नामों को बुलाते हैं जो उनके मार्केटिंग एजेंडे में फिट बैठते हैं। यह उत्सव अब विचारों की नई जमीन नहीं तलाश रहा, बल्कि पुरानी बातों की जुगाली कर रहा है।

प्रायोजकों का गुलाम बनता साहित्य:
फेस्टिवल के हर कोने पर कॉर्पोरेट ब्रांड्स के बड़े-बड़े होर्डिंग्स देखकर लगता है कि लेखकों की आवाज इन ब्रांड्स के नीचे दब गई है। जब साहित्य पूरी तरह से कॉर्पोरेट फंडिंग पर निर्भर हो जाता है, तो वह ‘सत्ता’ और ‘सिस्टम’ से सवाल पूछने की हिम्मत खो देता है। JLF अब एक ‘बौद्धिक विज्ञापन’ बन चुका है।

जयपुर की जनता को सिर्फ जाम और प्रदूषण मिला:
आयोजकों ने शहर के बुनियादी ढांचे की चिंता किए बिना भीड़ तो जुटा ली, लेकिन इसका खामियाजा जयपुर के आम नागरिक को भुगतना पड़ रहा है। घंटों का ट्रैफिक जाम, सड़कों पर फैला कचरा और शोर। जयपुर के लोगों के लिए JLF अब ‘सांस्कृतिक गौरव’ नहीं, बल्कि ‘सालाना सिरदर्द’ बन गया है।
आयोजक इसे ‘दुनिया का सबसे बड़ा मुफ्त साहित्यिक उत्सव’ कहते हैं, लेकिन इसकी भारी कीमत जयपुर की संस्कृति और साहित्य की गरिमा चुका रही है।

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