राजस्थान आवासन मंडल (RHB) की मंगलवार को आयोजित 254वीं बोर्ड बैठक एक बार फिर घोषणाओं और प्रस्तावों की भेंट चढ़ गई। नगरीय विकास एवं आवासन विभाग के प्रमुख शासन सचिव देबाशीष पृष्टी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में करोड़ों के नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरी तो दी गई, लेकिन आम आदमी के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये योजनाएं फाइलों से बाहर निकल पाएंगी?
घोषणाओं का अंबार, क्रियान्वयन पर सवाल-
बैठक में सिटी पार्क में ‘अटल काव्य स्मारक’ और ‘अटल लोकतंत्र उपवन’ के लिए डीपीआर और वास्तुविद की नियुक्ति को मंजूरी दी गई। मंडल जहां एक ओर नई स्मारकों पर भारी-भरकम बजट खर्च करने की तैयारी में है, वहीं शहर की पुरानी आवासीय योजनाओं में मूलभूत सुविधाओं का अभाव आज भी बना हुआ है। आलोचकों का तर्क है कि मंडल का ध्यान अब आवासीय संपत्तियां उपलब्ध कराने के बजाय केवल पार्कों और स्मारकों के सौंदर्यीकरण पर केंद्रित हो गया है, जो इसके मूल उद्देश्य से भटकाव है।
अधूरे प्रोजेक्ट्स और बढ़ती आवेदन तिथियां-
बैठक में हनुमानगढ़ और भिवाड़ी की आवासीय योजनाओं के लिए आवेदन की अवधि 28 फरवरी तक बढ़ाने का निर्णय लिया गया। प्रशासन इसे सकारात्मक प्रतिक्रिया बता रहा है, लेकिन हकीकत में यह इन योजनाओं के प्रति जनता की उदासीनता और कम होते रुझान को दर्शाता है। अगर ये योजनाएं वास्तव में आकर्षक होतीं, तो मंडल को बार-बार आवेदन की तारीखें बढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
पोर्टल और शिविरों का ‘डिजिटल’ झुनझुना
नगरीय विकास मंत्री के मार्गदर्शन में लेआउट प्लान संशोधन और भू-उपयोग परिवर्तन के लिए विशेष पोर्टल और जिलावार शिविरों की घोषणा की गई है। हालांकि, पूर्व में भी मंडल के कई ऑनलाइन पोर्टल तकनीकी खामियों और सुस्त अपडेट के कारण विफल साबित हुए हैं। ऐसे में नए पोर्टल के माध्यम से पारदर्शिता का दावा केवल कागजी खानापूर्ति नजर आता है।
आर्थिक बोझ और सुरक्षा की अनदेखी-
बैठक में ड्रोन सर्वे और आरएफएसडीएल के माध्यम से लंबित संपत्तियों के निस्तारण की बात कही गई, जो सीधे तौर पर मंडल की प्रशासनिक विफलता को उजागर करती है। सवाल उठता है कि मंडल की संपत्तियां इतनी बड़ी संख्या में लंबित और विवादित क्यों हुईं? साथ ही, आयुक्त द्वारा संपत्तियों की सुरक्षा के लिए सीमांकन और फेंसिंग के निर्देश देना यह साबित करता है कि करोड़ों की बेशकीमती सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का खतरा मंडरा रहा है और अब तक सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं थे।
कुल मिलाकर, 254वीं बोर्ड बैठक नई परियोजनाओं के नाम पर बजट खपाने का जरिया अधिक और आम जनता की आवासीय समस्याओं का समाधान कम नजर आती है। जब तक लंबित योजनाओं का कार्य पूर्ण नहीं होता, नए स्मारकों और उद्यानों पर जनता का पैसा खर्च करना मंडल की प्राथमिकता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।




