राजधानी के इंदिरा गांधी नगर में जो हुआ, वह केवल एक ‘अतिक्रमण’ नहीं, बल्कि राजस्थान आवासन मंडल के सुरक्षा तंत्र और सतर्कता के दावों की खुली पोल है। मंडल ने शुक्रवार को जिस 7000 वर्ग मीटर भूमि से अवैध निर्माण हटाया, वह कार्रवाई बहादुरी से ज्यादा विभाग की लापरवाही का स्मारक नजर आती है।
दो महीने तक सोता रहा प्रशासन—
हैरानी की बात यह है कि सेक्टर-1 जैसे महत्वपूर्ण इलाके में करीब 70 करोड़ रुपये की बेशकीमती व्यावसायिक जमीन पर भू-माफिया पिछले दो महीनों से नींव भर रहे थे, दीवारें खड़ी कर रहे थे, लेकिन मंडल के अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी जमीनों की रखवाली के लिए तैनात दस्ता दफ्तरों में बैठकर ‘सब चंगा है’ की रिपोर्ट बना रहा था? या फिर माफियाओं को विभाग के ही किसी ‘भीतरघाती’ का संरक्षण प्राप्त था?
जनता के टैक्स की बर्बादी—
जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया, तब जेसीबी मशीनों का शोर सुनाई दिया। इस देरी की वजह से न केवल सरकारी संपत्ति का स्वरूप बिगड़ा, बल्कि अवैध निर्माण को ढहाने में लगने वाला भारी-भरकम खर्च भी अंततः जनता की जेब पर ही बोझ बनेगा। अगर मण्डल की नीयत और नजरें साफ होतीं, तो माफिया की पहली ईंट रखते ही उसे उखाड़ फेंका जाता।
कागजी दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर—
सचिव गोपाल सिंह का यह बयान कि “अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है,” सुनने में तो प्रभावी लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि जब तक कार्रवाई का डंडा चला, तब तक माफियाओं ने सरकारी सिस्टम की धज्जियां उड़ा दी थीं। यह घटना विभाग के इंटेलिजेंस फेलियर का जीता-जागता सबूत है।
निवेशकों में खौफ का माहौल—
आवासन मंडल की इस सुस्ती ने उन आम नागरिकों और निवेशकों के मन में डर पैदा कर दिया है, जो मण्डल की योजनाओं पर भरोसा कर अपनी मेहनत की कमाई लगाते हैं। अगर 70 करोड़ की प्राइम लोकेशन वाली जमीन सुरक्षित नहीं है, तो फिर आम आदमी के छोटे भूखंडों का क्या होगा? यह कार्रवाई केवल खानापूर्ति लगती है। असली कार्रवाई तो तब मानी जाएगी जब उन अधिकारियों पर गाज गिरेगी जिनकी नाक के नीचे दो महीने तक यह ‘अवैध साम्राज्य’ पनपता रहा।




