
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक बिसात पर इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प और बहुआयामी नजर आ रहा है। राज्य की सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र में सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच की सीधी भिड़ंत ने बंगाल को भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा अखाड़ा बना दिया है। जहाँ एक तरफ तृणमूल कांग्रेस ‘बंगाली अस्मिता’ और अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं के दम पर किला बचाने में जुटी है, वहीं भाजपा ‘परिवर्तन’ और भ्रष्टाचार के मुद्दों को ढाल बनाकर सत्ता हथियाने की पुरजोर कोशिश कर रही है।
ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी के बीच का यह द्वंद्व पिछले कुछ चुनावों से बंगाल की राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है। पीएम मोदी की रैलियों में उमड़ती भीड़ और ममता बनर्जी का आक्रामक जमीनी प्रचार इस लड़ाई को आर-पार की जंग बना देता है। लेकिन इस बार राहुल गांधी की सक्रिय उपस्थिति ने समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है।
कांग्रेस और वामपंथी दलों का गठबंधन राज्य में तीसरे विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है। राहुल गांधी की रैलियां और न्याय यात्रा के दौरान मिले जनसमर्थन ने स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल उपस्थिति दर्ज कराने नहीं, बल्कि वोटों के गणित को प्रभावित करने आए हैं। राहुल गांधी के आने से मुकाबला अब केवल ‘दीदी बनाम दादा’ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह ‘त्रिकोणीय संघर्ष’ की ओर बढ़ता दिख रहा है।
जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी की मौजूदगी विशेष रूप से मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे इलाकों में टीएमसी और भाजपा दोनों के लिए चुनौती पैदा कर सकती है। यदि कांग्रेस-वाम गठबंधन अल्पसंख्यक और पारंपरिक कांग्रेस वोटों को अपने पाले में करने में सफल रहता है, तो इसका सीधा असर ममता बनर्जी के वोट बैंक पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, यह त्रिकोणीय मुकाबला सत्ता विरोधी वोटों के बंटवारे को भी प्रभावित करेगा, जो भाजपा के लिए चिंता का विषय हो सकता है। कुल मिलाकर, बंगाल की धरती पर ममता की ‘शक्ति’, मोदी का ‘प्रभाव’ और राहुल की ‘न्याय की राजनीति’ ने इस चुनाव को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहाँ हर सीट पर कड़ा संघर्ष तय है।




