राजस्थान के सबसे बड़े सवाई मानसिंह अस्पताल के चरक भवन में इन दिनों मरीजों की जान से ज्यादा कागजी खानापूर्ति और कर्मचारियों की मनमानी हावी है। अस्पताल के दावों के उलट धरातल पर स्थिति यह है कि दवाइयों का पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद मरीजों को ‘लोकल परचेज’ के नाम पर चक्कर कटवाए जा रहे हैं। सोमवार को एक चौंकाने वाला मामला सामने आया जहाँ एक 73 साल का बुजुर्ग घंटों लाइन में लगने के बाद सिस्टम की बेरुखी के कारण खाली हाथ घर लौटने को मजबूर हो गया।
ओपीडी कम, फिर भी अव्यवस्था भारी—
चरक भवन में सामान्य दिनों की तुलना में मरीजों की संख्या काफी कम रही। महज 600 मरीजों की ओपीडी दर्ज की गई, जो कि सामान्य औसत से बहुत कम है। कायदे से कम भीड़ के कारण व्यवस्थाएं चुस्त होनी चाहिए थी, लेकिन प्रशासन की ढिलाई के चलते मरीजों के लिए यह दिन भी भारी पड़ गया। काउंटर पर तैनात कर्मचारी काम में मुस्तैदी दिखाने के बजाय फोटोकॉपी और दस्तावेजों की कमियां निकालने में व्यस्त नजर आए।
73 साल के बुजुर्ग की बेबसी: ‘कल आना’—
सिस्टम की संवेदनहीनता का शिकार हुए 73 वर्षीय एक बुजुर्ग, जो दवा लेने के लिए दूर से आए थे। घंटों इंतजार के बाद जब उनका नंबर आया, तो कर्मचारियों ने दवा देने के बजाय फोटोकॉपी का बहाना बनाकर उन्हें टरका दिया। बुजुर्ग की थकान और उनकी उम्र का भी कोई लिहाज नहीं रखा गया। अंत में उन्हें एक ही जवाब मिला— “आज काम नहीं होगा, कल आना।” यह सवाल खड़ा करता है कि जब दवा स्टॉक में उपलब्ध है, तो महज एक फोटोकॉपी के चक्कर में किसी बुजुर्ग को दो दिन तक क्यों दौड़ाया जा रहा है?
स्टॉक में दवा, फिर लोकल खरीद का खेल क्यों?—
अस्पताल के भीतर चल रहे इस खेल की गूंज अब गलियारों में सुनाई दे रही है। सूत्रों की मानें तो स्टॉक में दवा उपलब्ध होने के बाद भी मरीजों को बाहर से दवा खरीदने या लोकल परचेज के लिए मजबूर किया जाता है। इसके पीछे किसी बड़े कमीशन के खेल की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रशासन के पास न तो इसकी कोई मॉनिटरिंग है और न ही कोई जिम्मेदारी तय करने वाला अधिकारी।
कर्मचारियों की मनमर्जी, प्रशासन नतमस्तक—
चरक भवन की इस बदहाली के लिए सीधे तौर पर कर्मचारियों की बेलगाम कार्यशैली जिम्मेदार है। प्रशासन उनकी मनमर्जी के आगे पूरी तरह नतमस्तक नजर आ रहा है। न तो कोई समय पर काउंटर पर मिलता है और न ही मरीजों की शिकायतों का निस्तारण होता है। राज्य सरकार की ‘मुफ्त दवा योजना’ की भावना को यहाँ का भ्रष्ट सिस्टम रोज कुचल रहा है।
अगर अस्पताल प्रशासन ने जल्द ही चरक भवन की इस लचर व्यवस्था को नहीं सुधारा और दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं की, तो वह दिन दूर नहीं जब आम जनता का इस प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान से भरोसा उठ जाएगा। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य के अधिकार की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ एसएमएस जैसे बड़े अस्पतालों में बुजुर्गों को दवा के लिए दो दिन का इंतजार करना पड़ता है।




