Rajasthan Assembly News: राजसथान विधानसभा की निजता भंग— लोकतंत्र के मंदिर में ‘रील-बाज़ी’

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राजस्थान विधानसभा आज ‘लोकतंत्र का मंदिर’ कम और सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं का ‘शूटिंग स्टूडियो’ ज़्यादा लगने लगी है। जिस जगह की सुरक्षा के नाम पर परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहाँ एक गैर-संवैधानिक व्यक्ति (शंकर गोरा) अपने हुजूम के साथ ऐसे टहलता है जैसे अपने घर के ड्राइंग रूम में घूम रहा हो। यह न केवल सुरक्षा में सेंध है, बल्कि उन सभी कायदे-कानूनों के मुँह पर तमाचा है जिनका हवाला देकर आम जनता को गेट के बाहर रोक दिया जाता है।

सुरक्षा का मखौल या वीआईपी सर्कस—

विधानसभा की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी क्या केवल आम आदमी का गला पकड़ने के लिए हैं? जब एक रसूखदार नेता फोन लहराते हुए स्पीकर के ऑफिस तक घुस गया, तब सुरक्षा प्रोटोकॉल क्या सो रहा था? यह वीडियो चीख-चीख कर कह रहा है कि यहाँ ‘कानून का राज’ नहीं, बल्कि ‘पहुँच का राज’ चलता है। अगर कल को कोई इसी तरह बिना रोक-टोक संवेदनशील दस्तावेज तक पहुँच जाए, तो ज़िम्मेदारी किसकी होगी?

संविधान की किताब पर रसूख का जूता—

अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) को इन नेताओं ने अपनी जागीर समझ लिया है। जब एक विधायक को भी सदन के भीतर फोन ले जाने पर टोक दिया जाता है, तो इस ‘रील-मंत्री’ को इतनी छूट कैसे मिली? मुख्यमंत्री जी, क्या आपका ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ केवल कागज़ों पर है? या फिर नियम सिर्फ उनके लिए हैं जिनके पास सत्ता का झंडा नहीं है? यह समानता नहीं, सरेआम संवैधानिक डकैती है।

स्पीकर की कुर्सी की गिरती साख—

वासुदेव देवनानी जी, आपकी नाक के नीचे विधानसभा अध्यक्ष के चैंबर का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर ‘भौकाल’ टाइट करने के लिए हो रहा है। यह आपकी नैतिक हार है। यदि आप अपने कार्यालय की गरिमा नहीं बचा सकते, तो पूरे प्रदेश में कानून व्यवस्था की उम्मीद करना बेमानी है। यह वीडियो एक चेतावनी है कि राजनीति ने संवैधानिक मर्यादाओं को निगल लिया है।

जनता के साथ गद्दारी—

आम आदमी जिस विधानसभा को अपनी आवाज़ का केंद्र मानता है, उसे आज कुछ छुटभैये नेताओं ने अपनी निजी संपत्ति बना लिया है। यह रील बनाना लोकतंत्र का सम्मान नहीं, बल्कि जनता के टैक्स से बने संस्थानों का अपमान है। यह ‘सत्ता का नशा’ है जो मर्यादा और कानून के बीच का फर्क भूल चुका है।

यह वीडियो वायरल होना कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि राजस्थान के प्रशासनिक और संवैधानिक तंत्र की बर्बादी का सबूत है। अगर आज इन ‘रील-बाजों’ पर एफआईआर नहीं होती, तो समझ लीजिए कि राजस्थान विधानसभा अब जनता की नहीं, बल्कि कुछ खास चेहरों की जागीर बन चुकी है।

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