राजस्थान में सुशासन और ‘डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन’ के बड़े-बड़े दावों के बीच सोमवार को शासन सचिवालय में आयोजित समीक्षा बैठक ने प्रशासनिक तंत्र की गंभीर उदासीनता को उजागर कर दिया है। मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में उपभोक्ता मामले और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की कार्यप्रणाली की समीक्षा तो की गई, लेकिन जो सबसे बड़ी खामी थी, उस पर मुख्य सचिव की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
डिजिटल राजस्थान का ‘पाषाण युग’: 15 साल पुरानी वेबसाइट—
हैरानी की बात यह है कि एक ओर सरकार ‘विकसित राजस्थान 2047’ का रोडमैप तैयार कर रही है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ता मामले विभाग की आधिकारिक वेबसाइट आज भी 15 साल पुरानी जानकारी के भरोसे चल रही है। बैठक के दौरान मुख्य सचिव ने हेल्पलाइन को प्रभावी और जवाबदेह बनाने के निर्देश तो दिए, लेकिन विभाग के इस “डिजिटल चेहरे” को अपडेट करने की जहमत नहीं उठाई। जब विभाग का ऑनलाइन पोर्टल ही अप्रासंगिक और पुराना हो, तो आम उपभोक्ता आधुनिक युग में सही मार्गदर्शन की उम्मीद कैसे कर सकता है?
निर्देशों की औपचारिकता, धरातल पर विफलता—
मुख्य सचिव ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि हेल्पलाइन को ‘संवेदनशील’ बनाया जाए ताकि त्वरित सहायता प्राप्त हो सके। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि बिना तकनीकी सुधार और अपडेटेड डेटा के, हेल्पलाइन केवल एक “कॉल सेंटर” बनकर रह जाएगी, जहाँ से उपभोक्ताओं को पुरानी और गलत जानकारी ही मिलेगी। समीक्षा बैठक में केवल हेल्पलाइन की मॉनिटरिंग पर जोर देना, समस्या की जड़—यानी विभाग के पुराने पड़ चुके डिजिटल ढांचे—को नजरअंदाज करने जैसा है।

मुख्य सचिव की जवाबदेही पर सवाल—
वी. श्रीनिवास, जो खुद केंद्र में प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग के सचिव रह चुके हैं, उनसे यह अपेक्षा थी कि वे विभाग की डिजिटल कमियों पर कड़ा प्रहार करेंगे। लेकिन वेबसाइट के नवीनीकरण के निर्देशों का अभाव यह दर्शाता है कि सचिवालय में होने वाली ये समीक्षा बैठकें अब केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गई हैं। अधिकारियों द्वारा पुरानी योजनाओं और आंकड़ों का प्रजेंटेशन देकर मुख्य सचिव को “सब ठीक है” का भ्रम परोसा गया, और बिना गहन पड़ताल के उसे स्वीकार कर लिया गया। यदि प्रदेश का सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी ही विभाग की इतनी बड़ी लापरवाही को अनदेखा कर दे, तो आम जनता का सिस्टम से भरोसा उठना लाजमी है। हेल्पलाइन को सुदृढ़ करने के खोखले वादे तब तक सार्थक नहीं होंगे, जब तक उपभोक्ताओं को डिजिटल माध्यमों पर सटीक और नवीनतम जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती। विभाग की वेबसाइट का अपडेट न होना सीधे तौर पर उपभोक्ता अधिकारों का हनन है, जिसके लिए शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी ही सबसे अधिक जिम्मेदार है।




