-महेश झालानी वरिष्ठ पत्रकार
राजस्थान की विधानसभा में आज जो वित्तीय लेखा-जोखा पेश हुआ, वह केवल आंकड़ों का मायाजाल था, जिसमें न तो राज्य की चुनौतियों से लड़ने की ‘धार’ थी और न ही भविष्य को संवारने का कोई ‘विज़न’। वित्त मंत्री दिया कुमारी का बजट भाषण सुनकर ऐसा महसूस हुआ मानो वे राज्य की तकदीर नहीं, बल्कि सचिवालय के गलियारों में अफसरों द्वारा तैयार किया गया एक ‘नीरस प्रेस नोट’ पढ़ रही हों।
बजट का यह स्वरूप बताता है कि जब सत्ता का अनुभवहीन नेतृत्व पूरी तरह ‘अफ़सरशाही’ के रहम-ओ-करम पर निर्भर हो जाता है, तो नतीजे कितने सतही हो सकते हैं। अफ़सरशाही का वर्चस्व, नेतृत्व का सरेंडर । बजट के पन्नों को पलटें तो स्पष्ट दिखता है कि वित्त सचिव वैभव गैलेरिया और उनकी टीम ने इसे एक ‘बैलेंस शीट’ की तरह तैयार किया है, जिसमें मानवीय संवेदनाओं और जनता की चीखों के लिए कोई जगह नहीं है।
वित्त मंत्री के प्रस्तुतिकरण में वह आत्मविश्वास और राजनीतिक पकड़ पूरी तरह नदारद रही, जो कभी वसुंधरा राजे के भाषणों की पहचान हुआ करती थी। मार्गदर्शन के अभाव में बजट का यह जहाज बिना किसी पतवार के कागजी समंदर में हिचकोले खाता नजर आया। यदि अनुभव के लिए शांति धारीवाल जैसे नेताओं के विकासवादी मॉडल को ही खंगाल लिया जाता, तो शायद राजस्थान को ‘ठहराव’ के बजाय ‘रफ़्तार’ मिलती।
अंधेरे में मध्यम वर्ग और उपेक्षित पत्रकारिता-
बजट में गृह निर्माण सहकारी समितियों में व्याप्त गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार पर जो चुप्पी साधी गई है, वह संदेह पैदा करती है। क्या सरकार इन भू-माफियाओं के रसूख के आगे बेबस है? एक तरफ आम आदमी अपने खून-पसीने की कमाई इन समितियों में फंसाए बैठा है, और दूसरी तरफ बजट में उन्हें इस ‘सिस्टम’ से निजात दिलाने का कोई जिक्र तक नहीं है।
यही हाल पत्रकारों का रहा, जिन्हें लोकतंत्र का प्रहरी बताने वाली सरकार ने पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया। बजट में उन मुद्दों पर कोई ‘रोडमैप’ नहीं दिखा जो आम जनजीवन को प्रभावित करते हैं । बढ़ते अपराधों पर लगाम लगाने के लिए बजट में कोई कठोर वित्तीय प्रावधान या आधुनिक पुलिसिंग का ढांचा नहीं दिखा।
सरकारी अस्पतालों की बदहाली और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के नाम पर केवल पुरानी योजनाओं की जुगाली की गई। मरीजों की बढ़ती भीड़ और सुविधाओं के अभाव पर बजट पूरी तरह मौन रहा। शहरों में ट्रैफिक जाम और सार्वजनिक शौचालयों जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए कोई दूरदर्शी नीति न होना यह बताता है कि सरकार जमीनी हकीकत से कितनी दूर है।
कुल मिलाकर, यह बजट न तो बेरोजगारों के काम आया, न महिलाओं को सुरक्षा का अहसास दिला पाया और न ही दिव्यांगों को संबल दे सका। यह केवल अनावश्यक खर्चों को ढोने वाला एक पारंपरिक दस्तावेज बनकर रह गया। जब किसी प्रदेश के बजट में ‘विजन’ की जगह ‘वैक्यूम’ (शून्यता) पैदा हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि शासन की कमान अनुभवी हाथों के बजाय फाइलों में उलझे अफसरों के पास चली गई है। राजस्थान को इस वक्त एक ‘स्टेट्समैन’ की जरूरत थी, लेकिन उसे मिला केवल एक ‘प्रेस नोट’।




