Jaipur News: कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में उछाल: हलवाइयों का ‘मुनाफा’ बढ़ा, आम आदमी की जेब कटी

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राजस्थान की राजधानी जयपुर में कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में हुई 993 रुपये की भारी बढ़ोतरी ने एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी है। जहां एक ओर ईंधन के दाम बढ़ने से लागत बढ़ने का शोर है, वहीं दूसरी ओर जयपुर के हलवाइयों और होटल संचालकों के लिए यह बढ़ोतरी ‘बल्ले-बल्ले’ साबित हो रही है। इस आर्थिक गणित के फेर में हलवाइयों का प्रति नग मुनाफा 4 रुपये तक बढ़ गया है, जिसका सीधा बोझ अब आम जनता और छात्रों की जेब पर पड़ रहा है।

लागत बढ़ी पैसे में, दाम बढ़े रुपयों में— 

शहर के अनुभवी हलवाई मुकेश शर्मा के अनुसार, कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में 993 रुपये की वृद्धि सुनने में बहुत बड़ी लगती है, लेकिन जब इसे एक नग समोसे या कचौरी की लागत पर तौला जाता है, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। एक कमर्शियल सिलेंडर से हजारों की संख्या में समोसे-कचौरी तैयार होते हैं। इस गणित के हिसाब से एक समोसे पर गैस का अतिरिक्त भार मात्र 83 पैसे पड़ता है। हैरानी की बात यह है कि इस मामूली लागत वृद्धि के नाम पर जयपुर के मिठाई विक्रेताओं और रेस्टोरेंट संचालकों ने समोसे-कचौरी की कीमतों में 5 रुपये तक की सीधी बढ़ोतरी कर दी है। जो कचौरी पहले 15-20 रुपये में मिलती थी, वह अब 25 रुपये तक पहुंच गई है।

मुनाफे का नया गणित—

कच्चे माल (मैदा, तेल, मसाला) और मजदूरी को मिलाकर एक समोसे की कुल लागत करीब 6 से 8 रुपये आती है। इसे 20 से 25 रुपये में बेचने पर दुकानदारों का मुनाफा अब 17 से 19 रुपये प्रति नग तक पहुंच गया है। सिलेंडर के दाम बढ़ने का बहाना बनाकर दरें बढ़ाना सीधे तौर पर ग्राहकों की जेब पर डाका डालने जैसा है।

छात्रों और जायके के शौकीनों पर मार—

जयपुर अपनी कचौरी और समोसों के स्वाद के लिए विश्व प्रसिद्ध है। लेकिन कीमतों में इस मनमानी वृद्धि ने शहर के जायके का गणित बिगाड़ दिया है। सबसे ज्यादा प्रभावित वे छात्र हो रहे हैं जो पीजी (पेइंग गेस्ट) में रहकर पढ़ाई करते हैं और नाश्ते या खाने के लिए इन्हीं दुकानों पर निर्भर हैं। पीजी संचालकों ने भी सिलेंडर के बहाने मेस के दामों में इजाफा कर दिया है, जिससे छात्रों का मासिक बजट चरमरा गया है।

993 रुपये की सिलेंडर वृद्धि ने हलवाइयों को दाम बढ़ाने का एक ‘वैध’ अवसर दे दिया है। महज 83 पैसे की अतिरिक्त लागत को ढाल बनाकर 5 रुपये की वसूली करना व्यापारिक नैतिकता पर सवाल खड़े करता है। प्रशासन की अनदेखी के कारण दुकानदार चांदी काट रहे हैं, जबकि ‘जयपुर का स्वाद’ अब आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है।

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