C M NEWS: महिला सशक्तिकरण और किसान कल्याण का संगम —मुख्यमंत्री 

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा रविवार को हनुमानगढ़ के प्रवास पर रहे। यहाँ आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में सम्मिलित होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री ने क्षेत्र के अन्नदाताओं से सीधा संवाद कर सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और कृषि क्षेत्र में किए गए सुधारों पर जमीनी फीडबैक लिया। किसानों ने जताया आभार: गेहूं पर बोनस और नहरी सुधार की सराहना— मुख्यमंत्री के आगमन पर श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ के किसानों में विशेष उत्साह देखने को मिला। किसानों ने राज्य सरकार द्वारा बजट में गेहूं की न्यूनतम समर्थन मूल्य खरीद पर 150 रुपये प्रति क्विंटल अतिरिक्त बोनस देने की घोषणा का स्वागत किया। किसानों ने मुख्यमंत्री को गेहूं की बालियों से बना गुलदस्ता भेंट कर अनूठे अंदाज में उनका अभिनंदन किया। अन्नदाताओं ने कहा कि इस निर्णय से उनकी आय में प्रत्यक्ष वृद्धि होगी और खेती के प्रति उत्साह बढ़ेगा। बिजली और पानी पर विशेष चर्चा— मुख्यमंत्री ने किसानों के साथ एक अनौपचारिक और सार्थक संवाद कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने खेती-किसानी से जुड़े प्रमुख विषयों जैसे—नियमित बिजली आपूर्ति, नहरों का सुदृढ़ीकरण और सिंचाई जल की उपलब्धता पर विस्तार से चर्चा की। विशेष रूप से फिरोजपुर फीडर की पानी वहन क्षमता बढ़ाने के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने किसानों से सुझाव लिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि नहरी तंत्र में सुधार करना और टेल (अंतिम छोर) तक पानी पहुँचाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री ने कहा, “किसानों के बीच बैठकर उनकी समस्याओं को समझना और मौके पर ही समाधान की राह निकालना हमारी कार्यशैली का हिस्सा है।” किसानों के योगदान की सराहना— संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री ने श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों को ‘राजस्थान का अन्न का कटोरा’ बताते हुए यहाँ के किसानों के पुरुषार्थ की सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रदेश को अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में इस क्षेत्र का अतुलनीय योगदान है। राज्य सरकार किसानों को न केवल आर्थिक संबल दे रही है, बल्कि आधुनिक तकनीक और सिंचाई के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए निरंतर सार्थक प्रयास कर रही है। महिला सशक्तिकरण का संदेश— इससे पूर्व, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के राज्य स्तरीय समारोह में मुख्यमंत्री ने प्रदेश की ‘आधी आबादी’ के उत्थान के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने विभिन्न योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के संकल्प को साझा किया। इस दौरे ने न केवल हनुमानगढ़ के नहरी क्षेत्र की समस्याओं के समाधान की उम्मीद जगाई है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि प्रदेश की भजनलाल सरकार ‘किसान’ और ‘नारी शक्ति’ को केंद्र में रखकर अपनी विकास नीतियों को आगे बढ़ा रही है।

Rajasthan NEWS: चतुर्थ श्रेणी भर्ती में ‘शून्य’ अंक वाले का चयन, कोर्ट ने व्यवस्था पर उठाए सवाल

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राजस्थान उच्च न्यायालय में एक ऐसा विचित्र मामला सामने आया है जिसने सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता और मानकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भर्ती से जुड़ा है, जहां शून्य अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी का चयन हो गया, जबकि ऋणात्मक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी ने अब नियुक्ति के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। अदालत की कड़ी टिप्पणी— न्यायाधीश आनंद शर्मा की एकलपीठ ने विनोद कुमार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इस स्थिति पर गहरी हैरानी जताई। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह स्थिति दो ही कारणों से पैदा हो सकती है या तो इस स्तर की नौकरी के लिए प्रश्नपत्र को अनावश्यक रूप से अत्यंत कठिन बनाया गया, या फिर भर्ती प्रक्रिया के लिए कोई उचित मानक तय नहीं किए गए। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों ही परिस्थितियां स्वीकार्य नहीं हैं। सरकारी सेवाओं में कार्मिक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कुशलता से कर सकें, इसके लिए भर्ती में एक न्यूनतम योग्यता मानक करना अनिवार्य है। क्या है पूरा मामला?— याचिकाकर्ता के अधिवक्ता हरेंद्र नील ने कोर्ट को बताया कि इस भर्ती में आरक्षित वर्ग की कट-ऑफ महज 0.0033 अंक रही। इसी आधार पर शून्य अंक वाले अभ्यर्थी को भी पात्र मान लिया गया। याचिकाकर्ता के अंक ऋणात्मक थे, जिसके कारण उसे चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि चूंकि राज्य सरकार ने इस भर्ती के लिए कोई न्यूनतम उत्तीर्ण अंक निर्धारित नहीं किए हैं, इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया में विसंगति है। अगली सुनवाई आज— हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कार्मिक विभाग और संबंधित अधिकारियों के लिए यह संकेत दिया है कि बिना मानक वाली भर्तियां प्रशासनिक ढांचे को कमजोर करती हैं। इस मामले पर अब आज को पुनः विस्तार से सुनवाई होगी, जिसमें सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।

Rajasthan News: महिला दिवस पर ‘सम्मान’ के भाषण और गेट पर दुपट्टों की ‘उतरवाई’, 

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हनुमानगढ़। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर रविवार को हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय पर आयोजित राज्य स्तरीय समारोह एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण के नारों से गूंजा, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर महिलाओं के साथ हुए व्यवहार ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी सहित भाजपा के दिग्गज नेता शामिल हुए। काले दुपट्टों पर ‘पहरा’, सुरक्षाकर्मियों ने उतरवाए— समारोह में शामिल होने आईं हजारों महिलाओं को प्रवेश द्वार पर एक अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पड़ा। सुरक्षाकर्मियों ने विरोध के डर से काले रंग के कपड़ों और सामान को लेकर सख्त रुख अपनाया। इस दौरान काले दुपट्टे पहनकर आई महिलाओं और युवतियों को गेट पर ही उन्हें उतारकर रखने को मजबूर किया गया। महिलाएं सुरक्षाकर्मियों से विनती करती रहीं कि दुपट्टा उनकी मर्यादा और पहनावे का हिस्सा है, लेकिन ड्यूटी पर तैनात महिला पुलिसकर्मियों ने किसी की एक न सुनी। नतीजतन, प्रवेश द्वार पर काले दुपट्टों और पर्स का ढेर लग गया। भाषणों में सम्मान, धरातल पर कड़वा अनुभव— विडंबना तब और स्पष्ट हुई जब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने मंच से महिलाओं के सम्मान में भावुक संबोधन दिया। उन्होंने शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” (जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं)। एक ओर मंच से नारी शक्ति की वंदना हो रही थी, वहीं दूसरी ओर सभा स्थल के बाहर महिलाएं अपने दुपट्टे वापस पाने के लिए जद्दोजहद कर रही थीं। किसान नेता को किया डिटेन— सुरक्षा का घेरा इतना सख्त था कि मुख्यमंत्री की सभा में शामिल होने जा रहे अखिल भारतीय किसान सभा के जिला महासचिव मंगेज चौधरी को पुलिस ने पहले ही डिटेन कर लिया ताकि किसी भी प्रकार के विरोध प्रदर्शन की संभावना को रोका जा सके। महिला दिवस जैसे गरिमामयी अवसर पर सुरक्षा के नाम पर दुपट्टे उतरवाने की इस घटना ने सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय गलियारों तक इस “दोहरे मापदंड” की तीखी चर्चा हो रही है।

JDA NEWS: जयपुर में जेडीए की खाली जमीन अब मिलगी किराए पर 

गुलाबी नगरी के विकास और शहरी नियोजन को नई दिशा देने के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण  ने एक महत्वपूर्ण और अभिनव निर्णय लिया है। जेडीए ने अपनी विभिन्न रिक्त संपत्तियों और भूखंडों को अल्प अवधि के लिए किराए पर देने की नई व्यवस्था लागू कर दी है। प्राधिकरण द्वारा शुक्रवार को इस संबंध में आधिकारिक दरें और आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए, जिससे अब शहरवासी और संस्थाएं जेडीए की खाली जमीनों का सुव्यवस्थित उपयोग कर सकेंगी। सार्वजनिक संपत्तियों का होगा बेहतर सदुपयोग— इस पहल का मुख्य उद्देश्य शहर में सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराना है। अक्सर शहर में बड़े आयोजनों के लिए खाली जमीन की तलाश एक बड़ी चुनौती होती है, वहीं जेडीए की कई प्राइम लोकेशन वाली संपत्तियां खाली पड़ी रहती थीं। नई नीति से न केवल सार्वजनिक परिसंपत्तियों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा, बल्कि जेडीए के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी। व्यवसायिक गतिविधियों के लिए खुलेंगे नए द्वार— जेडीए द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, इन रिक्त भूखंडों का उपयोग व्यापक स्तर पर व्यावसायिक कार्यों के लिए किया जा सकेगा। इसमें निजी कंपनियां और उद्यमी अपने साइट ऑफिस, मेंटेनेंस स्टोरेज, प्रदर्शनी, कार वॉशिंग यूनिट, स्टोन व मार्बल विक्रय केंद्र जैसे प्रतिष्ठान स्थापित कर सकेंगे। इसके अलावा मनोरंजन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए गेम जोन, सर्कस और मेलों के लिए भी ये जमीनें किराए पर उपलब्ध होंगी। सामाजिक और शैक्षणिक कार्यों को प्राथमिकता— गैर-व्यवसायिक उपयोग के लिए भी जेडीए ने उदार नीति अपनाई है। शहर के खाली भूखंडों का उपयोग अब सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों, सामूहिक विवाह सम्मेलनों, और शैक्षणिक संस्थानों के कार्यक्रमों के लिए किया जा सकेगा। साथ ही, सरकारी और अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं को अपनी गतिविधियों के संचालन के लिए प्राथमिकता दी जाएगी। यातायात प्रबंधन को सुदृढ़ करने के लिए इन स्थानों पर अस्थायी पार्किंग की अनुमति भी दी जाएगी और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से नर्सरी विकसित करने के लिए भी स्थान उपलब्ध कराए जाएंगे। पारदर्शिता और नियमों का पालन अनिवार्य— जेडीए प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि संपत्तियों का आवंटन निर्धारित शर्तों और अल्प अवधि के लिए ही किया जाएगा। इसके लिए आवेदन प्रक्रिया और दरों का निर्धारण जोनवार और स्थान की उपयोगिता के आधार पर किया गया है। प्राधिकरण का मानना है कि इस कदम से शहर के बीचों-बीच बिखरी पड़ी खाली जमीनों पर होने वाले अवैध अतिक्रमणों पर भी लगाम लगेगी। जेडीए की यह योजना जयपुर के शहरी ढांचे में एक सकारात्मक बदलाव लेकर आएगी। जहाँ एक ओर आम जनता को मांगलिक और सामाजिक कार्यों के लिए किफायती दरों पर जमीन मिलेगी, वहीं दूसरी ओर छोटे और बड़े व्यवसायों को अस्थायी गतिविधियों के लिए सुलभ स्थान प्राप्त होगा। प्राधिकरण की यह पहल ‘स्मार्ट सिटी’ की अवधारणा को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

Rajasthan News: प्रदेश में खाद के साथ जबरन उत्पाद बेचने वालों की अब खैर नहीं

राजस्थान की भजनलाल सरकार प्रदेश के किसानों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह मुस्तैद है। शुक्रवार को विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने स्पष्ट किया कि उर्वरकों (खाद) के साथ अन्य गैर-जरूरी उत्पाद ‘टैगिंग’ या जबरन जोड़कर बेचने वाले विक्रेताओं पर सरकार ने हंटर चला दिया है। उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि अन्नदाता पर किसी भी प्रकार का अनावश्यक आर्थिक भार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हजारों निरीक्षण और सैकड़ों लाइसेंस रद्द— विधायक ललित मीणा द्वारा पूछे गए पूरक प्रश्नों का उत्तर देते हुए डॉ. मीणा ने विभागीय कार्रवाई के आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने खाद की कालाबाजारी और जबरन बिक्री रोकने के लिए 744 अधिसूचित उर्वरक निरीक्षकों की टीम को मैदान में उतारा है। इस टीम ने अब तक प्रदेश भर में 11,938 औचक निरीक्षण किए हैं। गुणवत्ता जांच के लिए उर्वरकों के 18,319 नमूने लिए गए हैं। उन्होंने बताया कि नियमों के उल्लंघन पर 765 फर्मों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं, जबकि 381 फर्मों की बिक्री पर तत्काल रोक लगा दी गई है। सबसे बड़ी कार्रवाई के तहत 169 विक्रेताओं के विक्रय प्राधिकार पत्र निलंबित या निरस्त कर दिए गए हैं। किसानों पर आर्थिक बोझ डालने की कोशिश नाकाम— कृषि मंत्री ने स्वीकार किया कि अक्सर शिकायतें मिलती हैं कि उर्वरक विक्रेता डीएपी या यूरिया के साथ ऐसे कीटनाशक या अन्य उत्पाद अटैच कर देते हैं जिनकी किसानों को जरूरत नहीं होती। इससे किसानों की लागत बढ़ जाती है। डॉ. मीणा ने कहा, “हमने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि उर्वरकों के साथ अन्य उत्पादों के जबरन अटैचमेंट को रोका जाए। विक्रेताओं और आपूर्तिकर्ताओं को सख्त चेतावनी दी गई है कि यदि ऐसी गतिविधि पाई गई, तो उनका व्यापार बंद कर दिया जाएगा।” रेगुलेटरी टास्क फोर्स रखेगी नजर— उर्वरकों की सुचारू उपलब्धता और वितरण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने ‘फर्टिलाइजर रेगुलेटरी टास्क फोर्स’ का गठन किया है। यह टास्क फोर्स राज्य और जिला, दोनों स्तरों पर काम कर रही है। मंत्री ने बताया कि पीक सीजन के दौरान विभागीय अधिकारियों की विशेष ड्यूटी लगाई गई ताकि वे स्वयं विक्रेताओं के पास मौजूद रहकर खाद का वितरण करवा सकें। अन्नदाता के हित सर्वोपरि— डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने सदन में दोहराया कि सरकार का लक्ष्य किसानों को उचित मूल्य पर और बिना किसी शर्त के खाद उपलब्ध कराना है। उन्होंने किसानों से भी अपील की है कि यदि कोई विक्रेता उन्हें खाद के साथ जबरन कोई अन्य सामान लेने के लिए मजबूर करता है, तो वे तुरंत कृषि विभाग के टोल-फ्री नंबर या जिला कृषि कार्यालय में शिकायत दर्ज कराएं। इस बयान के बाद सदन में किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार की सक्रियता की चर्चा रही। सरकार की इस सख्ती से उन बिचौलियों और मुनाफाखोरों में हड़कंप है जो खाद की कमी का फायदा उठाकर किसानों का शोषण करते रहे हैं।

Rajasthan News: अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं —शिक्षा मंत्री

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निर्णय और नसीहतों के बीच राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है। जयपुर के शिक्षा संकुल में शुक्रवार को आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर और विभिन्न शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच तीखी और वैचारिक बहस देखने को मिली। नए सत्र की तैयारी और NEP 2020 पर मंथन— 1 अप्रैल से शुरू होने वाले नए शैक्षणिक सत्र को लेकर आयोजित इस बैठक का मुख्य एजेंडा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन पर केंद्रित था। शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार का लक्ष्य केवल साक्षरता बढ़ाना नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। बैठक में आगामी ‘प्रवेशोत्सव’ को एक उत्सव के रूप में मनाने और ‘मेगा पीटीएम’ (अभिभावक-शिक्षक बैठक) के माध्यम से अभिभावकों को सरकारी स्कूलों के प्रति जागरूक करने की रणनीति पर विस्तृत चर्चा हुई। इस दौरान एक ऐसा क्षण आया जिसने वहां मौजूद सभी प्रतिनिधियों को चौंका दिया। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने शिक्षकों को नसीहत देते हुए कहा कि व्यवस्था में सुधार की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए। उन्होंने सभागार में मौजूद शिक्षक संगठनों के पदाधिकारियों से कहा, “आप सभी यहाँ से यह शपथ लेकर जाएं कि आप अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाएंगे।” मंत्री का मानना है कि जब शिक्षक स्वयं अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजेंगे, तो जनता का विश्वास इन संस्थानों के प्रति स्वतः बढ़ जाएगा। शिक्षक संगठनों का पलटवार: “सिर्फ हम ही क्यों?— मंत्री की इस नसीहत पर शुरुआत में तो सन्नाटा पसर गया, लेकिन जल्द ही शिक्षक संगठनों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। संगठनों ने एक सुर में मांग उठाई कि यदि सरकारी स्कूलों के प्रति विश्वास जगाना है, तो यह नियम केवल शिक्षकों पर ही क्यों लागू हो? उन्होंने तर्क दिया कि राजकोष से वेतन प्राप्त करने वाले प्रत्येक व्यक्ति—चाहे वह आईएएस अधिकारी हो, पुलिसकर्मी हो, नेता हो या अन्य सरकारी कर्मचारी—उन सभी के लिए अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना अनिवार्य होना चाहिए। शिक्षकों का कहना है कि जब नीति निर्माता और उच्चाधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजेंगे, तभी संसाधनों और व्यवस्थाओं में वास्तविक सुधार आएगा। उन्होंने इसे केवल शिक्षकों की जिम्मेदारी मानने के बजाय एक ‘साझा जवाबदेही’ बनाने की वकालत की। भविष्य की राह— बैठक में शिक्षकों के तबादलों, रिक्त पदों को भरने और गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्ति जैसे पुराने मुद्दों पर भी चर्चा हुई। हालांकि, ‘अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने’ की बहस ने अन्य सभी मुद्दों को पीछे छोड़ दिया। शिक्षा मंत्री ने प्रतिनिधियों की बातों को सुना और संकेत दिए कि सरकार शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी। अब देखना यह होगा कि 1 अप्रैल से शुरू होने वाले नए सत्र में यह ‘शपथ’ और ‘साझा जिम्मेदारी’ की बहस धरातल पर क्या बदलाव लाती है। क्या राजस्थान देश का ऐसा पहला राज्य बनेगा जहाँ सरकारी सेवा में होने की पहली शर्त बच्चों का सरकारी स्कूल में पढ़ना होगी?

Vidhan Sabha News: सभापति संदीप शर्मा के घंटी बजाने पर सदन में गतिरोध

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राजस्थान विधानसभा में गुरुवार, 5 मार्च 2026 को भारी हंगामे और तीखी नोकझोंक के बीच ‘राजस्थान दुकान एवं वाणिज्यिक अधिष्ठान (संशोधन) विधेयक-2026’ ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। सदन की कार्यवाही के दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिला, जिसके चलते सदन को आधे घंटे के लिए स्थगित करना पड़ा। हंगामे की मुख्य वजह: सभापति और डोटासरा के बीच बहस—  विवाद उस समय शुरू हुआ जब कांग्रेस विधायक हरिमोहन शर्मा इस विधेयक पर अपनी बात रख रहे थे। चर्चा के दौरान आसन पर बैठे सभापति संदीप शर्मा ने समय सीमा का ध्यान दिलाने के लिए घंटी बजाई। इस पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कड़ी आपत्ति जताई। डोटासरा का तर्क था कि विधेयक पर चर्चा के दौरान किसी सदस्य को घंटी बजाकर टोकना संसदीय परंपराओं के खिलाफ है। सभापति ने स्पष्ट किया कि उन्होंने केवल समय के प्रति सचेत किया था, लेकिन बहस जल्द ही व्यक्तिगत टिप्पणियों में बदल गई। सभापति शर्मा ने कहा कि सदन में आसन का सम्मान सर्वोपरि है और डोटासरा को इस तरह के व्यवहार से बचने की हिदायत दी। वेल में उतरे विधायक, हाथापाई की नौबत— हंगामा इतना बढ़ गया कि कांग्रेस विधायक एकजुट होकर सदन के वेल में आ गए और नारेबाजी करने लगे। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब सत्तापक्ष के सदस्य भी अपनी सीटों से उठकर सामने आ गए। संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल और मंत्री अविनाश गहलोत ने डोटासरा के व्यवहार की निंदा की और उन्हें ‘आदतन उल्लंघनकर्ता’ बताया। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक समय पर शिक्षा मंत्री मदन दिलावर और कांग्रेस सदस्य हाकिम अली के बीच शारीरिक टकराव जैसी स्थिति भी बन गई थी। सदन स्थगित और अध्यक्ष का फैसला— बिगड़ते हालात को देखते हुए सभापति अर्जुनलाल जीनगर (जिन्होंने संदीप शर्मा का स्थान लिया था) ने सदन की कार्यवाही आधे घंटे के लिए स्थगित कर दी। सदन दोबारा शुरू होने पर सत्तापक्ष ने डोटासरा के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने सदन को आश्वासन दिया कि वे पूरे घटनाक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग और टेलीकास्ट की समीक्षा करेंगे और शुक्रवार को अपना निर्णय देंगे। विधेयक के मुख्य प्रावधान— हंगामे के बावजूद, जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत के जवाब के बाद सदन ने बिल पास कर दिया। इस संशोधन के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं: काम के घंटे: दैनिक कार्य समय को 9 से बढ़ाकर 10 घंटे किया गया है। ओवरटाइम: तिमाही ओवरटाइम की सीमा 50 घंटे से बढ़ाकर 144 घंटे कर दी गई है। बाल श्रम पर रोक: दुकानों में काम करने की न्यूनतम आयु 12 से बढ़ाकर 14 वर्ष की गई है। साथ ही, 14 से 18 वर्ष के किशोरों के लिए रात में काम करना प्रतिबंधित होगा। विश्राम का समय: लगातार काम करने की अवधि 5 से बढ़ाकर 6 घंटे की गई है, जिसके बाद आधा घंटा अवकाश अनिवार्य होगा। सरकार का दावा है कि इन बदलावों से राज्य में निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, जबकि विपक्ष ने इसे मजदूरों के शोषण का जरिया बताया है।

Rajasthan News: 27 अप्रैल को लगेगी संभाग स्तरीय ‘पेंशन अदालत’, पेंशनर्स 25 मार्च तक कर सकेंगे आवेदन

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राजस्थान के पेंशनरों और पारिवारिक पेंशनरों के लिए राहत भरी खबर है। राज्य के पेंशन विभाग ने उनकी पेंशन संबंधी समस्याओं और शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए संभाग स्तर पर पेंशन अदालत आयोजित करने का निर्णय लिया है। पेंशन व पेंशनर्स कल्याण निदेशालय के अनुसार, यह अदालत 27 अप्रैल 2026 को आयोजित की जाएगी। निदेशक महेन्द्र सिंह भूकर ने बताया कि पेंशनभोगियों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए अब वर्ष में चार बार इन अदालतों का आयोजन किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य पेंशनर्स को अदालतों या सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने से बचाना और एक ही छत के नीचे उनकी समस्याओं का निस्तारण करना है। आवेदन की महत्वपूर्ण जानकारी:— आवेदन की अंतिम तिथि: समस्या निवारण हेतु पेंशनर अपने आवेदन आवश्यक दस्तावेजों के साथ 25 मार्च 2026 तक जमा करा सकते हैं। यहाँ जमा करें आवेदन: पेंशनर अपने आवेदन पत्र पेंशन विभाग, शिक्षा विभाग के क्षेत्रीय कार्यालयों या संबंधित जिला कोषालयों में व्यक्तिगत रूप से या डाक के माध्यम से प्रस्तुत कर सकते हैं। त्रैमासिक कार्यक्रम: वर्ष 2026-27 के लिए प्रथम अदालत अप्रैल में होगी, जिसके बाद आगामी अदालतें जुलाई 2026, अक्टूबर 2026 और जनवरी 2027 में आयोजित की जानी प्रस्तावित हैं। इस अदालत में मुख्य रूप से पेंशन के निर्धारण में देरी, एरियर का भुगतान, पीपीओ (PPO) संबंधी सुधार और पारिवारिक पेंशन जैसे मामलों पर सुनवाई की जाएगी। विभाग ने निर्देश दिए हैं कि सभी लंबित प्रकरणों को प्राथमिकता के आधार पर संकलित किया जाए ताकि 27 अप्रैल को अधिक से अधिक पेंशनर्स को लाभ मिल सके। पेंशनर्स अपनी सुविधा के लिए IFMS 3.0 पोर्टल से अपनी पेंशन स्लिप और अन्य डिजिटल दस्तावेज़ भी प्राप्त कर सकते हैं।

Rajasthan News: सरकार ने आमजन को राहत देने के लिये 11 कानूनों में किया संशोधन  

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राज्य विधानसभा द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण विधेयक के माध्यम से राजस्थान वन अधिनियम 1953 से लेकर जयपुर जलप्रदाय और मलवहन बोर्ड अधिनियम 2018 तक, कुल 11 पुराने कानूनों में बड़े संशोधन किए गए हैं। इस कदम का मुख्य उद्देश्य ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा देना और छोटी गलतियों के लिए जेल जाने के डर को खत्म करना है। लाइसेंस के बिना भंडारण: अब जेल नहीं, भारी जुर्माना—  इस विधेयक के सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक राजस्थान भाण्डागार अधिनियम 1958 में किया गया संशोधन है। पुराने नियम के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति बिना वैध लाइसेंस के भंडारण (Warehousing) करता पाया जाता था, तो उसे एक साल तक की जेल या 1,000 रुपये का मामूली जुर्माना, या दोनों भुगतने पड़ते थे। बदले हुए नियमों के तहत, सरकार ने कारावास के प्रावधान को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। अब व्यापारियों को जेल नहीं जाना होगा, लेकिन उनकी जेब पर बोझ बढ़ाया गया है। अब बिना लाइसेंस भंडारण पर शास्ति (Penalty) की राशि को 1,000 रुपये से बढ़ाकर सीधे 50,000 रुपये तक कर दिया गया है। यह संशोधन उन छोटे और मध्यम उद्यमियों के लिए राहत भरा है जो अनजाने में कानूनी जटिलताओं में फंसकर आपराधिक रिकॉर्ड का सामना करते थे। पेयजल का गलत उपयोग: अब देना होगा प्रतिदिन हर्जाना— पानी की किल्लत से जूझने वाले राजस्थान में पेयजल के दुरुपयोग पर भी नकेल कसी गई है। पहले घरेलू पेयजल कनेक्शन का गैर-घरेलू या व्यावसायिक उपयोग करने पर एक वर्ष तक की जेल की सजा का प्रावधान था। नए संशोधन के तहत जेल की सजा को हटा दिया गया है, लेकिन आर्थिक दंड को सख्त बनाया गया है। अब यदि कोई घरेलू नल से व्यावसायिक काम करता है, तो उसे प्रतिदिन न्यूनतम 200 रुपये से लेकर अधिकतम 1,000 रुपये तक का जुर्माना देना होगा। यह नियम यह सुनिश्चित करेगा कि लोग संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करें, बिना इस डर के कि उन्हें छोटी सी चूक के लिए सलाखों के पीछे जाना पड़ेगा। कानूनों का आधुनिकीकरण और सरलीकरण— इस विधेयक के माध्यम से सरकार ने केवल भंडारण या पानी ही नहीं, बल्कि राजस्थान स्टाम्प अधिनियम 1998, राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009, और राजस्थान साहूकार अधिनियम 1963 जैसे कई महत्वपूर्ण कानूनों को वर्तमान समय के अनुकूल बनाया है। अक्सर पुराने कानूनों में जेल के प्रावधान निवेश के रास्ते में बाधा बनते थे। इन संशोधनों के जरिए राज्य सरकार ने यह संदेश दिया है कि राजस्थान अब व्यापार के लिए अधिक उदार और पारदर्शी बन रहा है। वन अधिनियम से लेकर शैक्षिक संस्थाओं तक के नियमों में यह बदलाव प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने और आम जनता को अनावश्यक कानूनी मुकदमों से बचाने की दिशा में एक साहसिक कदम है। राजस्थान सरकार का यह ‘सुधारात्मक रवैया’ राज्य के आर्थिक ढांचे को मजबूती देगा। जहां एक तरफ ‘अपराधीकरण’ से राहत मिली है, वहीं दूसरी तरफ भारी आर्थिक दंड अनुशासन बनाए रखने में मदद करेगा।

SMS NEWS: स्टॉक में दवा, फिर भी बुजुर्गों को ‘कल आना’ का थप्पड़

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राजस्थान के सबसे बड़े सवाई मानसिंह अस्पताल के चरक भवन में इन दिनों मरीजों की जान से ज्यादा कागजी खानापूर्ति और कर्मचारियों की मनमानी हावी है। अस्पताल के दावों के उलट धरातल पर स्थिति यह है कि दवाइयों का पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद मरीजों को ‘लोकल परचेज’ के नाम पर चक्कर कटवाए जा रहे हैं। सोमवार को एक चौंकाने वाला मामला सामने आया जहाँ एक 73 साल का बुजुर्ग घंटों लाइन में लगने के बाद सिस्टम की बेरुखी के कारण खाली हाथ घर लौटने को मजबूर हो गया। ओपीडी कम, फिर भी अव्यवस्था भारी— चरक भवन में सामान्य दिनों की तुलना में मरीजों की संख्या काफी कम रही। महज 600 मरीजों की ओपीडी दर्ज की गई, जो कि सामान्य औसत से बहुत कम है। कायदे से कम भीड़ के कारण व्यवस्थाएं चुस्त होनी चाहिए थी, लेकिन प्रशासन की ढिलाई के चलते मरीजों के लिए यह दिन भी भारी पड़ गया। काउंटर पर तैनात कर्मचारी काम में मुस्तैदी दिखाने के बजाय फोटोकॉपी और दस्तावेजों की कमियां निकालने में व्यस्त नजर आए। 73 साल के बुजुर्ग की बेबसी: ‘कल आना’— सिस्टम की संवेदनहीनता का शिकार हुए 73 वर्षीय एक बुजुर्ग, जो दवा लेने के लिए दूर से आए थे। घंटों इंतजार के बाद जब उनका नंबर आया, तो कर्मचारियों ने दवा देने के बजाय फोटोकॉपी का बहाना बनाकर उन्हें टरका दिया। बुजुर्ग की थकान और उनकी उम्र का भी कोई लिहाज नहीं रखा गया। अंत में उन्हें एक ही जवाब मिला— “आज काम नहीं होगा, कल आना।” यह सवाल खड़ा करता है कि जब दवा स्टॉक में उपलब्ध है, तो महज एक फोटोकॉपी के चक्कर में किसी बुजुर्ग को दो दिन तक क्यों दौड़ाया जा रहा है? स्टॉक में दवा, फिर लोकल खरीद का खेल क्यों?— अस्पताल के भीतर चल रहे इस खेल की गूंज अब गलियारों में सुनाई दे रही है। सूत्रों की मानें तो स्टॉक में दवा उपलब्ध होने के बाद भी मरीजों को बाहर से दवा खरीदने या लोकल परचेज के लिए मजबूर किया जाता है। इसके पीछे किसी बड़े कमीशन के खेल की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रशासन के पास न तो इसकी कोई मॉनिटरिंग है और न ही कोई जिम्मेदारी तय करने वाला अधिकारी। कर्मचारियों की मनमर्जी, प्रशासन नतमस्तक— चरक भवन की इस बदहाली के लिए सीधे तौर पर कर्मचारियों की बेलगाम कार्यशैली जिम्मेदार है। प्रशासन उनकी मनमर्जी के आगे पूरी तरह नतमस्तक नजर आ रहा है। न तो कोई समय पर काउंटर पर मिलता है और न ही मरीजों की शिकायतों का निस्तारण होता है। राज्य सरकार की ‘मुफ्त दवा योजना’ की भावना को यहाँ का भ्रष्ट सिस्टम रोज कुचल रहा है। अगर अस्पताल प्रशासन ने जल्द ही चरक भवन की इस लचर व्यवस्था को नहीं सुधारा और दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं की, तो वह दिन दूर नहीं जब आम जनता का इस प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान से भरोसा उठ जाएगा। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य के अधिकार की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ एसएमएस जैसे बड़े अस्पतालों में बुजुर्गों को दवा के लिए दो दिन का इंतजार करना पड़ता है।