प्रदेश में अपेक्स बैंक ने 635 पदों पर निकाली भर्ती, ऑनलाइन आवेदन 17 नवंबर 2023 तक

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राजस्थान में अपेक्स बैंक ने बंपर भर्ती निकाली है। इसके लिये राजस्थान कॉ-ऑपरेटिव रिक्रूटमेंट बोर्ड ने 635 विभिन्न पदों पर भर्ती के लिए योग्य उम्मीदवारों से आवेदन आमंत्रित किए हैं। इच्छुक उम्मीदवार ऑनलाइन आवेदन फॉर्म 17 नवंबर 2023 तक भर सकते हैं। अपेक्स बैंक भर्ती 2023 के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू है। इच्छुक और योग्य उम्मीदवार बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट rajcrb.rajasthan.gov.in से ऑनलाइन आवेदन फॉर्म भर सकते हैं।

बगावती सुर-तेवर से जुझ रही भाजपा की कल बुधवार को सांवरिया जी में महत्वपूर्ण बैठक

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भूपेन्द्र औझा

समन्वय! मेवाड़ – वागंड में अपनों के बगावती सुर-तेवर से जुझ रही भाजपा की कल बुधवार को सांवरिया जी में उदयपुर संभाग की महत्वपूर्ण बैठक हो रही है। बैठक की आपको अहमियत का इसी से अंदाजा हो जाएगा कि,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ श्रेत्रिय प्रचारक नीमाराम जी, चितौड़गढ़ प्रांत प्रचारक विजयानंद जी, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सी पी जोशी, दिल्ली भाजपा संगठन महामंत्री पवन राणा, उदयपुर संभाग भाजपा प्रभारी दामोदर अग्रवाल, सांसद कनकमल कटारा के बैठक में भाग लेने के संकेत हैं। केन्द्रीय मंत्री एवम राजस्थान भाजपा चुनाव प्रबंधक प्रहलाद जोशी, प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह के भी कल बुधवार को उदयपुर संभाग सांवरिया जी बैठक में भाग लेने की संभावना है। सांवरिया जी बैठक में संघ चितौड़गढ़ प्रांत तथा उदयपुर संभाग के बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, उदयपुर, राजसमंद, चितौड़गढ़, भीलवाड़ा जिले के भाजपा जिला प्रभारी,विस्तारक, जिलाध्यक्ष के साथ उनके जिले के विधानसभा क्षेत्रों की संघ एवम भाजपा प्रदेश नेतृत्व द्वारा वहां की मौजूदा राजनीतिक स्थिति का फीडबैक ओर विधानसभा चुनाव रणनीति पर चर्चा करने के संकेत हैं।
उदयपुर संभाग में भाजपा में बांसवाड़ा के बागीदौरा, डूंगरपुर, उदयपुर, नाथद्वारा, कुम्भलगढ़, चितौड़गढ़, राजसमंद, सीट पर भाजपा घोषित उम्मीदवार के खिलाफ इलाके के भाजपा नेता – कार्यकर्ताओं द्वारा टिकट बदलने , निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारने की चेतावनी दे रहे हैं। इस नाते विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कल बुधवार दोपहर चितौड़गढ़ जिले में सांवरिया जी मंदिर के पास भाजपा -संघ के आलाधिकारी की पार्टी के सात जिलों के नेताओं के साथ अहम् समन्वय बैठक के खासी अहमियत रखने के संकेत हैं।

कच्ची उम्र में बढ रहे यौन संबंध, फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट

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अशोक शर्मा
पिछले दिनों कोलकाता हाईकोर्ट ने पाक्सो एक्ट के तहत एक फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि किशोरियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। वे दो मिनट के सुख के लिए समाज की नजरों से गिर जाती हैं। यह टिप्पणी जस्टिस चितरंजन दास और जस्टिस पार्थ सारथी सेन ने एक नाबालिग़ को यौन उत्पीडन के आरोप से बरी करते हुए दी, जबकि उसे जिला अदालत ने दोषी करार दिया था। क्योंकि उसने एक नाबालिग लडकी से यौन संबंध स्थापित कर लिया था। जब कि दोनों में प्रेम संबंध था और लडकी के अनुसार दोनों ने आपसी सहमति से सेक्स किया था। इसके साथ ही अदालत ने कहा कि किशोरों को भी युवतियों की गरिमा और स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने अभिभावकों से भी कहा कि वे अपने बच्चों को गुड टच,बेड टच के अलावा अच्छी-बुरी संगत तथा प्रजनन तंत्र के बारे में सही जानकारी और ज्ञान दें। कोर्ट ने बच्चों के संरक्षण अधिनियम पर भी चिंता जताते हुए सुझाव दिया कि अभी लड़के-लड़कियों में यौन संबंध बनाने की उम्र 18 साल है, उसे 16 साल कर दिया जाना चाहिए। क्योंकि 16 साल की उम्र के बाद लड़के-लड़कियों में यौन संबंध बन जाने पर अभी उसे अपराध की श्रेणी में देखा जाता है। यह अब की स्थितियों को देखते हुए ठीक नहीं।
हमारे शास्त्र यह बात बहुत पहले कह चुके हैं कि 16 साल की उम्र में लडकी राजस्वला हो जाती है। अर्थात उसने यौन संबंध स्थापित करने की कुदरती योग्यता हासिल कर ली, महाभारत में वर्णित है कि अभिमन्यु 16 साल की उम्र में वीरगति को प्राप्त हो गया था और उस समय उसकी पत्नी उत्तरा गर्भवती थी जो कि अभिमन्यु से तीन साल छोटी थी, यानि कि मात्र 13 साल की। तो फिर आज लड़कियों के यौन संबंध स्थापित करने के लिए 18 साल की उम्र की बंदिश क्यों ॽ अतः यहां कोलकाता हाईकोर्ट की दलील एकदम सही है। अब एक खास बात ये कि कोर्ट ने सलाह दी है कि किशोरियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। यह कैसे संभव है ॽ इस उम्र में कुदरत ने जिस उपहार को उन्हें प्रदान कर दिया, उस पर वे नियंत्रण कैसे करें। यह उम्र वैचारिक रूप से इतनी परिपक्व नहीं होती कि वे इस पर नियंत्रण रख सकें। इस उम्र में लड़के-लड़कियां पाप-पुण्य को भी ठीक से समझ नहीं पाते, ऐसे में वे इस पर नियंत्रण न रख पाने के दुष्प्रभाव को कैसे समझें।
यह सच है कि इसी उम्र में अधिकांशतः लड़के-लड़कियां यौन स्पर्श सुख की अकल्पनीय अनुभूति प्राप्त कर लेते हैं और धीरे-धीरे वे इसमें सहज होते चले जाते हैं। इंडियन नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 40 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि वे 18 साल की उम्र से पहले ही कई बार सेक्स कर चुकी थीं और 24 प्रतिशत लड़कियों ने भी स्वीकार किया कि उन्होंने 15 साल की उम्र से पहले कई इस सुख को प्राप्त कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्होंने साफ-साफ कहा कि वे 13 से 14 के बीच की उम्र में ही यौन संबंध बना चुकी थीं। हेल्थ सर्वे ने कहा कि भारत में कच्ची उम्र में सेक्स संबंधों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। यहां सबसे अजीबोगरीब स्थिति यह है कि इस मामले में लड़कियों से लडके बहुत पीछे हैं।
एक और सच यह भी है कि आज के दौर में इस उम्र में लड़के-लड़कियों में इस तरह के स्पर्श सुख की इच्छाएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं जो समाज के लिए विस्फोटक हालात की दस्तक है, और इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हम ही हैं। कच्ची और नासमझ उम्र में हम उनके हाथ में मोबाइल पकड़ा देते हैं जिनमें समाचारों के बीच-बीच में अश्लील सामग्री के ढेरों क्लिप्स आते रहते हैं जिन्हें अनजाने में ही देखते हुए बच्चे उसमें इनवाल्व होने लगते हैं। और जब वो ऐसा वैसा कुछ कर लेते हैं तो हम सिर पकड़ कर बैठ जाते हैं कि यह क्या हो गया। यह हकीकत है कि जहां हमें जिम्मेदार होना चाहिए वहां हम हैं ही नहीं। और जब जिम्मेदार नहीं हैं तो उसके परिणाम भोगने ही पड़ेंगे। चूंकि यह सर्व विदित है कि स्त्री-पुरुष के बीच प्रथम स्पर्श के बाद शारीरिक बदलाव आना शुरू हो जाते हैं। आज-कल 15-16 साल के लड़के-लड़कियों में वह शारीरिक बदलाव आ जाते हैं जो विवाहोपरान्त स्त्री-पुरुष में आते हैं, और यह बदलाव उसी का परिणाम है, लेकिन हम ही गौर नहीं करते हैं।

नाराजगियों के बारूद में विस्फोट, मुस्लमान और संघ को तवज्जोह नहीं

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अशोक शर्मा
राजस्थान में राजनीतिक महाभारत शुरू हो गई है। कांग्रेस और भाजपा दोनों की सेनाएं मैदान में उतर रही हैं लेकिन दोनों पार्टियों ने उम्मीदवारों को टिकट देने में जो पैतरेबाजी की, उससे पार्टियों में आपस में ही घमासान मच गया। कांग्रेस में कम, भाजपा में बहुत ही ज्यादा। इस समय भाजपा की हालत सबसे ज्यादा खराब है। मात्र चार दिनों में ही चित्तौड़गढ़, राजसमंद, कोटा, उदयपुर, सोजत, अलवर, बूंदी, सांगानेर और छबडा में विरोधी भाजपाई सड़कों पर उतर आए हैं, वे बहुत ज्यादा गुस्से में हैं। इनमें सबसे ज्यादा गुस्सा चित्तौड़गढ़ के सांसद और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी के प्रति है।
सीपी जोशी का पुतला फूंक दिया तो उधर राजसमंद में भाजपा के आफिस में तोडफोड कर दी।
यद्यपि दोनों ही पार्टियों के लगभग 70 प्रतिशत उम्मीदवार घोषित हो गए हैं और यहां एक मजेदार बात देखने को मिली कि जहां भाजपा में वसुन्धरा समर्थक लगभग सभी उम्मीदवारों को टिकट दे दिया गया वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में गहलोत के खास तीनों मंत्रियों के टिकटों का अभी तक अता-पता नहीं। आश्चर्य यह भी कि भाजपा ने जिन 41 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की उसमें एक भी मुस्लिम केंडिडेट नहीं है, जबकि कांग्रेस की सूची में अब तक कई नाम आ गए। भाजपा की अब तक जारी की गई सूचियों में 10 महिलाओं को टिकट दिया गया जबकि कांग्रेस द्वारा जारी सूची में 27 प्रतिशत महिलाओं। लेकिन पूरे राजस्थान के 200 विधानसभा क्षेत्रों में कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जहां दोनों ही पार्टियों में नाराजगियों की जलकुंभी न फैली हो। अब नाम घोषित हो गए हैं तो जिन्हें टिकट नहीं मिला वो तथा उनके समर्थक विद्रोह के मार्ग हैं, और यह स्थिति दोनों पार्टियों में है।
इस बार न 70 पार की दलील काम आई न युवा चेहरों को मौका का वादा काम आया और न ही कोई और चालाकी चली। अंततः दोनों पार्टियों को पुराने खिलाड़ियों को ही टिकट देने पडे। भाजपा की तो सारी पूर्व प्लानिंग ही फेल हो गई। लेकिन एक काम ठीक हुआ कि अब केन्द्र की अकड़ भी थोडी नर्म पड गई। अंततः वसुन्धरा को उसके समर्थकों को टिकट देकर खुश करना ही पड़ा। लेकिन यह केन्द्र की मजबूरी थी, सहयोग नहीं, क्योंकि वसुन्धरा ने भी ठान ली थी कि वह अपने समर्थकों को टिकट दिये बिना आगे नहीं बढ़ेंगी। सो वही हुआ। अगर केन्द्र ऐसा नहीं करता तो राजस्थान में भाजपा का जीतना तो बहुत दूर की बात, पांव तक नहीं जम पाते। इसलिए चुपचाप समझौता हुआ।एक और बात कि राजस्थान भाजपा ने इस बार संघ को भी कोई तवज्जोह नहीं दी जबकि संघ ने लगभग एक दर्जन सीट पर अपने नाम सुझाए थे, लेकिन भाजपा उससे कन्नी काट गई।
अब सबसे पहले बात सूर्यकांता व्यास की। पिछ्ले माह पीएम मोदी जोधपुर आए थे तब वे सूर्यकांता व्यास से भी मिले। श्रीमती व्यास ने मोदी जी से अनुरोध किया कि उनका टिकट नहीं काटें, लेकिन केन्द्र से आई लिस्ट में व्यास का नाम नहीं था। व्यास को यह सजा अशोक गहलोत की तारीफ करने की मिली। चूंकि गहलोत ने उनकी कुल देवी के मंदिर के लिए पांच करोड रुपए की मंजूरी दे दी थी, जिस पर श्रीमती व्यास ने गहलोत की भरपूर प्रशंसा कर दी। बस, यही मोदी जी को चुभ गई और इसका परिणाम यह हुआ कि श्रीमती व्यास को भाजपा के टिकट से महरूम कर दिया गया।लगभग 90 साल की श्रीमती व्यास अब मोदी जी के इस व्यवहार से बेचैन हैं। ऐसे ही उधर 90 साल के कैलाश मेघवाल किनारे किये हुए हैं। उन्होंने भी कभी गहलोत की तारीफ कर दी थी सो उन्हें भी कोई चांस नहीं दिया गया।
इस बार न 70 पार की दलील काम आई न युवा चेहरों को मौका का वादा काम आया और न ही कोई और चालाकी चली। अंततः दोनों पार्टियों को पुराने खिलाड़ियों को ही टिकट देने पडे। भाजपा की तो सारी पूर्व प्लानिंग ही फेल हो गई। लेकिन एक काम ठीक हुआ कि अब केन्द्र की अकड़ भी थोडी नर्म पड गई। अंततः वसुन्धरा को उसके समर्थकों को टिकट देकर खुश करना ही पड़ा। लेकिन यह केन्द्र की मजबूरी थी, सहयोग नहीं, क्योंकि वसुन्धरा ने भी ठान ली थी कि वह अपने समर्थकों को टिकट दिये बिना आगे नहीं बढ़ेंगी। सो वही हुआ। अगर केन्द्र ऐसा नहीं करता तो राजस्थान में भाजपा का जीतना तो बहुत दूर की बात, पांव तक नहीं जम पाते। इसलिए चुपचाप समझौता हुआ।एक और बात कि राजस्थान भाजपा ने इस बार संघ को भी कोई तवज्जोह नहीं दी जबकि संघ ने लगभग एक दर्जन सीट पर अपने नाम सुझाए थे, लेकिन भाजपा उससे कन्नी काट गई।
अब सबसे पहले बात सूर्यकांता व्यास की। पिछ्ले माह पीएम मोदी जोधपुर आए थे तब वे सूर्यकांता व्यास से भी मिले। श्रीमती व्यास ने मोदी जी से अनुरोध किया कि उनका टिकट नहीं काटें, लेकिन केन्द्र से आई लिस्ट में व्यास का नाम नहीं था। व्यास को यह सजा अशोक गहलोत की तारीफ करने की मिली। चूंकि गहलोत ने उनकी कुल देवी के मंदिर के लिए पांच करोड रुपए की मंजूरी दे दी थी, जिस पर श्रीमती व्यास ने गहलोत की भरपूर प्रशंसा कर दी। बस, यही मोदी जी को चुभ गई और इसका परिणाम यह हुआ कि श्रीमती व्यास को भाजपा के टिकट से महरूम कर दिया गया।लगभग 90 साल की श्रीमती व्यास अब मोदी जी के इस व्यवहार से बेचैन हैं। ऐसे ही उधर 90 साल के कैलाश मेघवाल किनारे किये हुए हैं। उन्होंने भी कभी गहलोत की तारीफ कर दी थी सो उन्हें भी कोई चांस नहीं दिया गया।
कल ही भोपाल में जोरदार वाकिया घट गया। वहां कांग्रेस के नाराज कार्यकर्ताओं ने दिग्विजयसिंह की फ़ोटो को जमकर जूते मारे फिर उस पर गोबर पोत दिया। नाराज कांग्रेसियों का गुस्सा यहीं शान्त नहीं हुआ, उन्होंने दिग्विजयसिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह का भी पुतला जलाया तथा भोपाल स्थित कांग्रेस कार्यालय में जमकर तोडफोड कर दी। उधर छत्तीसगढ़ में बीजेपी नेता को गोली मार दी गई। राजस्थान में चित्तौड़गढ़ के पूर्व विधायक चन्द्रभान सिंह आक्या ने चित्तौड़गढ़ के सांसद सीपी जोशी पर आरोप लगाया कि सीपी ने मेरा टिकट कटवा कर अपनी खुन्नस निकाली है। सीपी के घर पत्थर भी फेंके गए। नरपत सिंह राजवी, जो अब तक जयपुर के विद्याधर नगर के विधायक रहे थे, उनकी जगह दीया कुमारी को टिकट देकर राजवी को चित्तौड़गढ़ भेज दिया। पहले तो केन्द्र उन्हें टिकट देने के लिए तैयार ही नहीं था। लेकिन राजवी की राजनीतिक ताकत को देखते हुए उन्हें चित्तौड़गढ़ से टिकट दिया, लेकिन यहां भी उनका विरोध शुरू हो गया। चन्द्रभान ने सीधा आरोप लगाया कि सीपी जोशी और उनकी तकरार लम्बे समय से चल रही है और उन्होंने ही मुझसे खार निकाली है।
यहां पर एक और मजेदार बात यह कि भाजपा अब तक नारी शक्ति वंदना के गीत गा रही थी लेकिन अब जब टिकट देने का समय आया तो मात्र 10 महिलाओं को टिकट दिया। एक और आश्चर्य की बात कि राजेन्द्र राठौड़ चूरू से टिकट चाह रहे थे लेकिन उन्हें तारानगर भेज दिया। जिस सतीश पूनिया को नेता प्रतिपक्ष से पदावनत कर दिया गया, वही अब कह रहे हैं कि मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा राजस्थान में 150 सीटों पर जीत हासिल कर लेगी। यहां सतीश हवा में कुछ ज्यादा ही उड लिये हैं। इधर, अजमेर जिले के किशनगढ़ में इस बार भाजपा को पसीने आ सकते हैं तो अजमेर में भी पुराने खिलाड़ियों को ही टिकट दिये जाने पर नाराज भाजपाई तयशुदा खाई खोदेंगे। चूंकि अजमेर में पिछले 20 साल से दो ही नाम चल रहे हैं, एक वासुदेव देवनानी और दूसरा अनिता भदेल। लेकिन उत्तर में इस बार देवनानी के खिलाफ वैश्य समाज एकजुट है सो कुछ कहा नहीं जा सकता। अब इंतजार कांग्रेस कैंडिडेट का है कि यहां की दोनों सीटों पर किसे टिकट दिया जाता है, और उसका भाजपा पर कितना असर पड़ेगा, यह कांग्रेस के उम्मीदवार घोषित होने के बाद पता चलेगा कि वे उम्मीदवार भाजपा के घोषित उम्मीदवारों से वजनी हैं या नहीं।
वैसे मोदी जी का भी जवाब नहीं। हाल ही में वे ग्वालियर गए। सिंधिया स्कूल के 120 वें स्थापना दिवस समारोह में भाग लेने। वहां उन्होंने कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया हमारे गुजरात के दामाद हैं। जबकि हकीकत यह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को पिछले चुनाव में कमलनाथ सरकार गिराने के लिए यूज करने के बाद किनारे कर दिया गया और आज भी वे यूज ही हो रहे हैं। इस बार उनके सभी 20 समर्थकों को टिकट नहीं दिया। इसे कहते हैं भीतर मारो और बाहर प्यार जताओ। जो मोदी जी ने कर दिखाया। फिलहाल दोनों ही पार्टियां जोर आजमाइश कर रही हैं।

एक नजर टिकटों के घमासान पर

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भूपेंद्र औझा
भाजपा में दो कांग्रेस ओर एक आरएलपी नेताओं को शामिल कर चुनाव मैदान में उतारने की कवायद अंतिम चरण में होने के संकेत हैं। भाजपा नेतृत्व के खासे निकट सूत्रों मुताबिक चूरू जिले मे कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे पूर्व मंत्री, चन्दनमल वैद्य के सुपूत्र तारानगर पूर्व विधायक सी आर वैद्य, सादुलपुर राजगढ़ पूर्व कांग्रेस विधायक नंदलाल पुनिया ओर उदयपुर जिले मे आरएलपी के प्रमुख नेता उदयलाल डांगी को कल परसों में भाजपा सदस्य ग्रहण कराने की खासी चर्चा है। भाजपा परिवार में शामिल कर डॉ वैद्य को चूरू जिले की सरदारशहर सीट से, पूर्व विधायक नंदलाल पुनिया की पुत्रवधू सुमित्रा पुनिया को कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया के सामने सादुलपुर राजगढ़ सीट पर तथा वल्लभनगर उपचुनाव में भाजपा से बगावत कर आर एलपी उम्मीदवार चुनाव मैदान में दूसरे स्थान पर रहने वाले उदयलाल डांगी को वल्लभनगर सीट से भाजपा उम्मीदवार चुनाव मैदान में उताराने की संभावना है।
ब्राह्मण बाहुल्य उदयपुर, चितौड़गढ़, राजसमंद जिले में भाजपा की जारी दोनों सूची में किसी भी ब्राह्मण को उम्मीदवार घोषित नहीं करने से ब्राह्मण समुदाय में भाजपा के लिए विपरीत प्रतिक्रिया व्यक्त की जाने लगी है। उस पर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सी.पी.जोशी के ब्राह्मण समुदाय से होने तथा उनके लोकसभा क्षेत्र चितौड़गढ़, उदयपुर ब्राह्मण समुदाय के निर्णायक वोट होने के बावजूद किसी को भी यहां भाजपा प्रत्याशी घोषित नहीं किया गया। जबकि उदयपुर में भाजपा जिलाध्यक्ष रवीन्द्र श्रीमाली की, राजसमंद में भाजपा मण्डल अध्यक्ष गणेश पालीवाल की, मावली में भाजपा विधायक धर्मनारायण जोशी की, बैगू में स्थानीय भाजपा पूर्व जिला महामंत्री एवम चितौड़गढ़ भूमी विकास बैंक पूर्व चेयरमैन की भाजपा में मतबूत दावेदारी थी। भाजपा के परम्परागत मजबूत वोट बैंक ब्राह्मण समुदाय को दक्षिण राजस्थान में विधानसभा चुनाव दौरान भाजपा प्रतिनिधित्व देने बाबत ब्राह्मण समुदाय बाहुल्य उदयपुर जिले मावली तथा चितौड़गढ़ जिले में बैगू सीट ही बची है।

भाजपा दिल्ली मुख्यालय आला सूत्रों मुताबिक भाजपा नेतृत्व द्वारा केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल तथा कैलाश चौधरी को राजस्थान विधानसभा चुनाव मैदान में उतारने की संभावना बेहद कम है। मंत्रियों अर्जुन राम मेघवाल को खाजूवाला, अनूपगढ़ सीट से तथा कैलाश चौधरी को जैसलमेर जिले की सीटों पर उतारने की चर्चा थी। भाजपा नेतृत्व नेअनूपगढ़ सीट पर मौजूदा भाजपा विधायक बावरी को फिर मौका दे दिया तो,बीकानेर के खाजूवाला सीट पर डा विश्वनाथ के साथ मांगीलाल मेघवाल का नाम चर्चा में है। देवीसिंह भाटी के कारण खासी चर्चा में रही बीकानेर जिले में कोलायत विधानसभा क्षेत्र में भाजपा नेतृत्व के पूर्व मंत्री देवी सिंह भाटी के अलावा उनकी पुत्रवधू कंवर पुनम तथा पौत्र अंशुमान सिंह भाटी के नाम पर विचार चलने के संकेत मिले हैं। भरतपुर जिले के डीग कुम्हेर सीट पर पूर्व मंत्री दिगंबर सिंह के सुपूत्र शैलेन्द्र सिंह को भाजपा प्रत्याशी घोषित करने से अब भाजपा में ओर भी नेताओं के परिवारजनों को टिकट मिलने के आसार नजर आ रहे हैं। ऐसे ही चूरू भाजपा जिलाध्यक्ष हरलाल सहारण को चूरू विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी घोषित करने से उम्मीदवार ऐलान से वंचित ओर भी सीटों पर अब भाजपा जिलाध्यक्ष को उम्मीदवार घोषित करने की राह खुली है।

प्रियंका वाड्रा अनफिट, राजस्थान को नहीं होगा कोई फायदा

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प्रियंका वाड्रा, कांग्रेस पार्टी की महासचिव। वे दो दिन पहले दौसा आई थीं। वहां उसने पीएम मोदी को लेकर जो कुछ कहा उसने प्रियंका की ही शख्सियत को हल्का किया। पहले प्रियंका ने मालासेरी डूंगरी के मंदिर में बंद लिफाफे में दिये गए 21 रूपए का राग अलापा और उसके बाद भाजपा के मोदी फेस पर चुनाव लडने की बात पर चुटकी ली कि क्या मोदी राजस्थान के सीएम बनेंगे। और तीसरा यह कि यहां बीजेपी के सभी नेता खुद को सीएम घोषित कर रहे हैं। दो टूक,ये वो घिसी-पिटी बातें हैं जो कई बार उछाली जा चुकी हैं। अब इन बातों का कोई मतलब नहीं। राजस्थान के चुनाव से जस्ट पहले प्रियंका की यह पहली सभा थी अतः उन्हें मंच पर आने से पहले होमवर्क करके आना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस स्पीच ने प्रियंका की शख्सियत को ही हल्का किया। अतः प्रियंका का राजस्थान आने का कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होगा। जबकि वे कांग्रेस की महासचिव हैं, आश्चर्य कि उनकी दादी कुशल राजनीतिज्ञ थीं, उनके पिता भारत के पीएम रहे, उनके भाई राहुल की अपनी राजनीतिक शख्सियत है लेकिन प्रियंका ने बतौर कुशल राजनीतिज्ञ अपना कोई निर्माण नहीं किया। वे बस सोनिया गांधी की बेटी हैं और राहुल की बहिन। इसीलिए जानी जाती हैं। उन्हें ले-देकर राजनीति में दो दशक हो गए, बावजूद कोई परिपक्वता नहीं। प्रियंका से ज्यादा अच्छा और सटीक तो सचिन पायलट ही बोल लेते हैं। सचिन ने जब भी स्पीच दी, फिजूल के मुद्दों पर नहीं दी, तार्किक लहज़े में गंभीर मुद्दों पर ही दी। लेकिन अफ़सोस प्रियंका की दौसा में यह स्पीच फेलियर थी। उनका राजस्थान आना निरर्थक ही रहा।
भले ही प्रियंका वाड्रा की शक्ल सूरत अपनी दादी इंदिरा गांधी से मिलती हो लेकिन उसमें इन्दिरा गांधी जैसी न काबलियतें हैं और न ही वैसी राजनीतिक चालाकियां और न ही भाषण देने का वह प्रभावपूर्ण लहजा। भले ही उसने जन्म से ही घर-आंगन में राजनीति का माहौल देखा हो लेकिन उसमें न वो तेवर आए और ना ही वो अंदाज आए। उनके व्यक्तित्व में एक नेता है ही नहीं। और नहीं है तो उन्होंने दिल से कभी कोशिश भी नहीं की। 2018 से लेकर अब तक प्रियंका ने कई राजनीतिक सभाओं को सम्बोधित किया। बावजूद उसने कुछ नहीं सीखा। यकीनी तौर पर इस तरह की स्पीच की उम्मीद न गहलोत ने की होगी और न सचिन ने। पहले मोर्चे पर ही प्रियंका की स्पीच प्रभावहीन साबित हो गई।
प्रियंका से ज्यादा अच्छा तो राहुल गांधी बोल लेते हैं। कभी-कभार को छोड़ दिया जाए तो वे मुद्दों पर ही बोले हैं और सटीक बोले हैं। यह अलग बात है कि गोदी मीडिया और ट्रोल आर्मी ने उन्हें नाकारा ही साबित करने की कोशिश की। वे कभी-कभार ही मुद्दों से भटकते हैं, और उसी में विपक्ष उनकी दलील का रायता फैला देता है। चूंकि अभी उनकी चवन्नी चल रही है। 2019 में जब प्रियंका वाड्रा ने खुलकर राजनीति में प्रवेश किया था तो यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि वह दूसरी इन्दिरा गांधी साबित होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फ़िलहाल दौसा में उनका भाषण प्रभावहीन ही साबित हुआ। अस्तु प्रियंका वाड्रा के व्यक्तित्व और स्पीच से राजस्थान कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होने वाला। यद्यपि वे युवावस्था में 1989 में अपने पिता के लिए अमेठी में चुनाव प्रचार कर चुकीं हैं, लेकिन तब से अब तक उन्होंने राजनीति की वो बारीकियां नहीं सीखीं जो उन्हें समय रहते सीख लेनी चाहिए थी, लेकिन शायद राजनीति उनका मक़सद था ही नहीं। इसीलिए उन्होंने खुद को राजनीति में नहीं निखारा।
कितना अंतर है प्रियंका और सचिन में। प्रियंका जवाहरलाल नेहरू की चौथी पीढ़ी हैं जबकि सचिन राजेश पायलट के पुत्र। जिस घर की दरो-दीवारों ने चार पीढ़ियों से राजनीति को जीया है उस घर की चौथी पीढ़ी प्रियंका कहीं से भी राजनीति में पारंगत नहीं। जबकि सचिन थोडे समय में ही कुशल राजनीतिज्ञ बन गए। ऐसे में राजस्थान को प्रियंका से किसी तरह के राजनीतिक फायदे की उम्मीद करना व्यर्थ ही होगा।

गहलोत की गद्दी पर फेवीकोल लगा है या उनके नीचे?

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सुरेन्द्र चतुर्वेदी
राजनीति में कुछ भी हो सकता है। कुछ भी यानि कुछ भी। सुई में धागे की तरह हाथी भी निकल सकता है। कम से कम कांग्रेस में तो यही हो रहा है। कल तक एक दूसरे की प्रभुसत्ता को मिट्टी में मिला देने की कसम खाने वाले अशोक गहलोत और सचिन पायलट टिकिट के बंटवारे में लगभग एक मत हो गए हैं।गहलोत ने कह दिया है कि मानेसर के बाड़े में बग़ावत करने वाले अधिकांश विधायकों को पुनः टिकिट दिया जा रहा है तो सचिन उनसे दो क़दम आगे निकल कर कह रहे हैं कि जिताऊ उम्मीदवार कोई हो उसे टिकिट दिया जाना चाहिए भले ही उसने सोनिया जी की अवमानना ही क्यों न की हो।
ज़ाहिर है कि सचिन अब शान्ति धारीवाल, महेश जोशी और धर्मेन्द्र राठौड़ को टिकिट दिए जाने के विरोधी नहीं। अंदर खाने सचिन और गहलोत यह समझ गए हैं कि एक दूसरे का साथ नहीं दिया गया तो नुक़सान दोनों का ही होगा।
अशोक गहलोत अच्छी तरह से जानते हैं कि सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनने का जो सपना देख रहे हैं उसके लिए उनके पास इस बार भी संख्या बल उनके मुक़ाबले नहीं आ सकेगा। उनकी गहलोत अपनी बोई हुई शानदार फ़सल को ख़ुद के लिए काटना चाहते हैं। यदि फ़सल में कीड़ा लगा हुआ होता तो शायद वह अपने लोगों को टिकिट दिए जाने और मानेसर वालों को टिकिट नहीं दिए जाने पर अड़ जाते ।उन्होंने ऐसा नहीं किया ।सभी को टिकिट दिए जाने पर सहमति व्यक्त कर दी।
यहाँ बता दूं कि सचिन पायलट के जितने लोगों को टिकिट दिए जा रहे हैं वह यदि सारे भी जीत जाएं तो उनका संख्या बल गहलोत की टीम से कम होगा। मानेसर के बाड़े में बन्द 18 विधायकों में से दावे के साथ सिर्फ 14 लोग ही वापस जीत जाएं तो बहुत होगा। यहाँ यह भी बता दूं कि पिछली बार जब सचिन प्रदेश अध्यक्ष थे तब उन्होंने अपने लगभग 124 नामों को टिकिट दिए थे जो बाद में पलटी खा गए और गहलोत के साथ हो लिए। इनमें से अधिकांश ने ही गहलोत के लिए बग़ावत के समय भी साथ दिया।
इस बार भी अधिकांश उन्ही लोगों को टिकिट मिल रहे हैं जो गहलोत की लिस्ट में हैं। ज़ाहिर है कि इनमें से जितने भी लोग जीत कर आएंगे वे गहलोत को ही समर्थन देंगे।
अब तो आप भी समझ गए होंगे कि क्यों गहलोत अक्सर ये जुमला कसते हैं कि वह तो मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ना चाहते हैं पर गद्दी उनको नहीँ छोड़ना चाहती। उन्होंने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यें कहा कि इस बार भी देखना गद्दी उनको ही पकड़े रखेगी।
मित्रों! संसार के वे पहले ऐसे नेता हैं जो यह कह रहे हैं कि वह गद्दी छोड़ना चाहते हैं गद्दी उनको नहीं छोड़ना चाहती। ज़रा कोई बताए कि गद्दी में फेवीकोल लगा है या अशोक गहलोत के नीचे। आख़िर क्या वज़ह है कि दोनों ही एक दूसरे के लिए ज़िन्दा हैं?
राजा राहुल यानि महात्मा बुद्ध जब सोती हुई अपनी पत्नी यशोधरा को राजगद्दी छोड़ कर सन्यासी हो गए तब उनके कोई फेवीकोल नहीं लगा था। वह आराम से राजपाठ छोड़ कर जंगलों में निकल गए मगर अशोक गहलोत को राजगद्दी नहीं छोड़ रही।
जबकि असलियत यह है कि पहले उनको सरदारपुरा से चुनाव जीतना होगा । यदि वहीं हार गए तो उनका फेवीकोल वहीं साफ़ हो जाएगा। राजगद्दी का फेवीकोल भी धरा रह जाएगा।
मेरे ख़याल से गहलोत का अभी से यह कहना कि राजगद्दी उनको छोड़ नहीं रही निरी मूर्खता है। पहले पार्टी को जीतने तो दो फिर गद्दी की बात करना । भाजपा को मिट्टी का खिलौना मत समझो।परिपाटी के हिसाब से तो कांग्रेस आने वाली ही नहीं। और हाँ ,सचिन व गहलोत के बीच हुए युध्द विराम और सचिन के इस वक्तव्य से कि यदि उम्मीदवार जिताऊ है तो उसको टिकिट दिया जाना चाहिए चाहे उसने सोनिया जी की अवमानना ही क्यों न की हो अब शान्ति धारीवाल ,महेश जोशी और धर्मेन्द्र राठौड़ के दरवाज़े टिकिट के लिए फिर खुल गए हैं। शानदार वक़ील हो तो हारा हुआ केस जितवा देता है।
गहलोत यदि अपने तीनों जिगर के टुकड़ों को टिकिट दिलवा देते हैं और सचिन उनके रास्ते की दीवार नहीं बनते हैं तो यह भी बहुत बड़ी जीत होगी। ये बात अलग है कि इस खेल में सोनिया और राहुल गांधी की इज़्ज़त का फलूदा बन जायेगा क्यों कि चुनाव समिति की बैठक में इन नामों के लिए उन्ही ने फच्चर ठोका था।

गरबों की आड में यौनाचार

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अशोक शर्मा
माता रानी के दरबार में जाने के लिए घर से निकाली और अपने आशिक के पास पहुंच गई। दोनों रतिक्रिया में लिप्त थे कि तभी धर लिये गए। यह घटना है इन्दौर की। यहां पर एक लड़की अपने घर से यह कह कर निकली कि वह माता के दरबार में गरबा नृत्य में शामिल होने जा रही है लेकिन उसकी जगह वह अपने एक मुसलमान आशिक के पास पहुंच गई। एक सरकारी शौचालय में दोनों नग्नावस्था में रतिक्रिया में लिप्त थे कि अचानक बजरंग दल के कुछ लोग वहां पहुंच गए और उन्होंने दोनों की पिटाई कर दी। चालाक मुस्लिम युवक खुद को घायल कर वहां से भाग गया। यह है गरबा नृत्य में शामिल होने जाने वाली कई लड़कियों और युवतियों की हक़ीक़त। गरबा नृत्य की आड में पिछले एक दशक से ऐसी ढेरों घटनाएं घट रही हैं। यह बात अकेले इन्दौर की नहीं है बल्कि पूरे देश की है।
कभी गुजरात में गरबा महोत्सव एक सांस्कृतिक परम्परा और माता के प्रति श्रद्धा के रूप में मनाए जाते थे लेकिन अब न श्रद्धा बची और न ही सांस्कृतिक परम्परा। अब इसमें आवारगियों ने प्रवेश कर लिया है। इस हकीकत को सब जानते हैं लेकिन कोई नहीं बोलता। पूछने पर एक ही जवाब कि ये रजामंदी से होते हैं, इसलिए कुछ नहीं कर सकते। आज से दस साल पहले इंडिया टुडे ने ” गरबों की आड़ में ” एक विशेषांक निकाला था, जिसमें स्पष्ट किया था कि गरबों के इन दस दिनों में निरोध के पैकेट और अन्य गर्भनिरोधक उपकरणों की देश भर में जबरदस्त बिक्री होती है और सबसे ज्यादा गुजरात में। चूंकि इन्ही दिनों में यह सब खूब होता है इसलिए बजरंग दल और भी कई संगठन ऐसी आवारगियों पर छापामारी के लिए सक्रीय हो जाते हैं। इन्दौर में जो मुस्लिम युवक और हिन्दू लड़की पकडे गए थे वह इन्ही दलों की सक्रियता का परिणाम था। वे टोह में बैठे थे कि दोनों आशिक मिजाज लपेट में आ गए।
वैब दुनियां की लेखक गायत्री शर्मा के अनुसार नवरात्रि पर्व के दौरान यद्यपि पूरे देश में युवक-युवतियों के बीच यौनाचार बढ रहा है। इसमें कुंआरे युवक-युवतियां शामिल हैं तो विवाहित भी जो चोरी-छिपे अन्य से भी इनवाल्व होना पसंद करते हैं। पिछले दस सालों में इसमें जबरदस्त इजाफा हुआ है। लेकिन गुजरात में यह परवान पर रहता है। इन दिनों कंडोम और अन्य गर्भनिरोधक उपकरणों की भारी मात्रा में खरीद-फरोख्त होती है। इसके अलावा गर्भपात कराने वाली युवतियों और लड़कियों की भी संख्या बढ रही है। अब तो यह मुम्बई, मध्यप्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में भी फैल गया है। इन दिनों मां की आराधना के नाम पर कलंक का बाजार गर्म रहता है।
गायत्री ने जो कहा, सच कहा। इन दिनों देश भर के शहरों में होटल बुक रहते हैं। हाल ही भोपाल में एक जगह 6 लड़कियां और 5 लड़के बंद कमरे में नग्न अवस्था में डांस करते पकड़े गए। दो दिन पहले बनासकांठा में एक गरबा पांडाल में दो मुस्लिम युवक हिन्दू का भेस बदल कर घुस गए। इसी तरह कल ही अहमदाबाद में गरबा कर रही युवतियों में दूसरे धर्म के दो युवक घुस गए। इस बात को लेकर वहां तनाव पैदा हो गया था। इकोनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार गरबों के दौरान इन दिनों कंडोम और अन्य गर्भनिरोधक की मांग में जबरदस्त उछाल आ गया है। लगभग 25 प्रतिशत बिक्री बढ गई है। फार्मासिस्ट और कैमिस्ट के यहां गरबों से दस दिन पहले ही भारी मात्रा में स्टाक जमा हो जाता है। अहमदाबाद स्थित स्टेवेल फार्मेसी के भरत सोनी का कहना है कि इन दिनों कंडोम और अन्य गर्भनिरोधक की बिक्री में भारी उछाल आ गया है। गरबों में जाने के लिए युवतियां और महिलाएं पहले ब्यूटी पार्लर जाने लगी हैं। इन ब्यूटी पार्लर बाज़ार में जम कर कमाई हो रही है। शादी-ब्याह के सीज़न से ज्यादा कमाई इसी मोके पर हो रही है। अब तो कुछ ब्यूटी पार्लर ऐसी शौक़ीन मिजाज युवतियों के लिए कंडोम और अन्य गर्भनिरोधक भी रखने लगे हैं, इसके अलावा और भी बहुत कुछ।
उल्लेखनीय है कि सन 2017 में फिल्म एक्ट्रेस सन्नी लियोन ने नवरात्रि थीम वाला अधोवस्त्रों में एक कंडोम विज्ञापन किया था, उस पर भारी बवाल हो गया। गुजरात के नाराज व्यापारियों ने इसकी शिकायत केन्द्रीय मंत्री से की थी। सन्नी लियोन कौन है, यह ज्यादा बताने की जरूरत नहीं, वे विश्व की एक मात्र सबसे महंगी ऐसी पोर्न स्टार हैं जिन्होंने शाय़द ही किसी ब्लू फिल्म में कपडे पहने हों। वैसे इन्होंने कुछ हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया है।