अजमेर के सभी लीडिंग न्यूज पेपर में 10 जनवरी को यह समाचार प्रकाशित हुआ कि विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने अजमेर की पेयजल समस्या में कोई सुधार नहीं होने पर जलदाय विभाग के अधिकारियों को फटकार लगाई यह कहते हुए कि शहर के अधिकांश क्षेत्रों में अब भी 72 से 96 घंटे के अंतराल से पानी सप्लाई हो रहा है। देवनानी ने जो कहा सच कहा चूंकि हकीकत यही है। 9 जनवरी के दैनिक नवज्योति समाचार पत्र में भी शहर में लडखडाई हुई पेयजलापूर्ति को लेकर खबर प्रकाशित हुई।
लगभग एक महीने पहले श्री देवनानी ने इन अधिकारियों को चेतावनी दी थी कि अगर 15 दिनों में अजमेर की पेयजल अव्यवस्था नहीं सुधरी तो सख्त कार्रवाई होगी। यह समाचार शहर के सभी अखबारों में प्रकाशित हुआ था लेकिन अब पुनः देवनानी को चेतावनी देनी पड़ी है तो क्यों ॽ मतलब कि देवनानी की उस चेतावनी को जलदाय विभाग ने हवा में उडा दिया। 15 दिन छोड एक महीना गुजर गया लेकिन हालात जस के तस हैं। अब भी वे सिर्फ चेतावनी दे रहे हैं। साहब जी, जिनकी आदतें बिगडी हुई हों वे फूंक मारने से नहीं सुधरती। आपकी धमकी का इन अधिकारियों पर कोई असर नहीं हुआ उल्टा इन्होंने 29 दिसम्बर को एक अखबार के माध्यम से अपनी बात छपवा कर आपकी चेतावनी को ठेंगा दिखा दिया। आश्चर्य इसी बात का कि इसी समाचार में जलदाय अधिकारियों की पूरी मिज़ाजपुर्सी की गई। कमाल है, दस दिन पहले यह ख़बर छपी है कि पाइप लाइनें दुरूस्त कर दी गई हैं, अब कहीं कोई पेयजल समस्या नहीं। और अब देवनानी जी कह रहे हैं कि अब भी 48 घंटे की जगह 72 तथा 96 घंटे में सप्लाई हो रही है। ऐसे में कौन झूठ बोल रहा है, जलदाय विभाग, रिपोर्टर या फिर देवनानी। जबकि हकीकत यह है कि शहर में चौथे दिन ही सप्लाई हो रही है।
उक्त ख़बर में लिखा था कि विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की चेतावनी के बाद जलदाय विभाग ने लीकेज मरम्मत के लिए अभिमान चलाया। विभाग ने दावा किया कि सात दिन में 125 लीकेज दुरूस्त कर दिए गए हैं। इससे पानी का प्रेशर तेज हुआ है। उपभोक्ताओं को अब पानी की सप्लाई को लेकर कोई परेशानी नहीं आ रही है। आश्चर्य, घोर आश्चर्य। सप्लाई सप्ताह में दो बार आती है और इतने कम समय में इन्होंने यह भी जांच लिया कि पूरे शहर में अब किसी को कोई परेशानी नहीं। इस पूरी खबर से एक बात गायब है कि देवनानी ने 48 घंटे के अंतराल में पेयजल वितरण व्यवस्था करने की चेतावनी दी थी लेकिन उस पर कोई वक्तव्य नहीं, बस दूसरी बातें लिख दी जिसका उस चेतावनी से कोई लेना-देना नहीं। तो फिर कल पुनः देवनानी जी को वही बात क्यों दोहरानी पडी। किसी की इतनी भी मिज़ाजपुर्सी अच्छी नहीं कि एक अखबार की छवि का बट्टा बैठ जाए, और इन बातों का ध्यान रखने की जिनकी जिम्मेदारी है उसे भी ध्यान रखना चाहिए कि उसके यहां रिपोर्टर क्या गुल खिला रहे हैं और वो ध्यान नहीं दे रहा तो मालिकों को ध्यान देना चाहिए कि उनके अखबार में हो क्या रहा है।
कमाल है ख़बरनवीस की काबिलियत का। अज़मेर शहर में 80 वार्ड हैं लेकिन यह सप्लाई कहां-कहां सुधरी इसका उल्लेख नहीं किया। पानी की अव्यवस्था को सुधारने की चेतावनी श्री देवनानी ने दी थी लेकिन ख़बर में उनका भी कोई वर्जन नहीं दिया, बस जलदाय अधिकारियों ने जो कहा वह छाप दिया। जबकि यह कायदा है कि किसी भी बडे मुद्दे की ख़बर को छापने पर दोनों के वर्जन प्रकाशित किये जाएं, तब वह ख़बर पूर्ण कहलाती है। लेकिन नहीं एईएन, जेईएन और एक्सईएन का हवाला प्रकाशित कर इतिश्री कर ली।
मजेदार बात देखिये कि यह खबर 29 दिसम्बर के अंक में प्रकाशित हुई थी और कल 10 जनवरी को उसी अखबार में पूर्व प्रकाशित खबर के खिलाफ श्री देवनानी के वर्जन से समाचार प्रकाशित हुआ कि मेरी चेतावनी के बाद भी शहर की पेयजल वितरण व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ। मतलब कि इस खबर ने 10 दिन पहले उसी अखबार में छपी ख़बर को फर्जी करार दे दिया। यह शर्मनाक है।
हक़ीक़त यह है कि पांच साल तक जो अधिकारीगण एक ही जगह जमे होते हैं वे अपनी जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। देवनानी जी, आप शहर की पेयजल वितरण व्यवस्था को लेकर सख्त बनें, सिर्फ चेतावनियों से किसी की चाल सीधी नहीं होती। आश्चर्य इस बात का है कि आपने पूरे पांच साल इन अधिकारियों की चालाकियों को बखूबी देखा और जाना और भोगा फिर भी सिर्फ पुनः चेतावनी।
दो साल पहले अजमेर की पत्रकार कालोनी में कुछ घपलेबाजों के कारण जल संकट खड़ा हो गया था। ये ही अधिकारीगण वहां जांच के नाम पर कुछेक बार आए और अपने मुंह लगे कुछ पत्रकारों के साथ कालोनी के बगीचे में बैठ कर चाय पानी पीकर और गप्पें मार कर चले गए। समस्या जस की तस रही। शहर में आज भी 48 घंटे के अंतराल पर नहीं 72 और 96 घंटे के अंतराल पर पानी वितरण हो रहा है और उस पर टाइम का कोई पता नहीं। सप्लाई किसी भी समय कर दी जाती है।
राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र में एक विशेषता है कि वहां चालाकी या चालूगीरी करने वाले अपने पत्रकारों के बारे में पता चलते ही मैनेजमेंट द्वारा तत्काल उसे इधर-उधर फेंक दिया जाता है। पहले इस अखबार में कुछ ऐसे चेहरे आए थे जिन्हें बाद में किसी को बाहर निकाल दिया गया तो किसी को सबक़ सिखाने के लिए उसका इधर-उधर ट्रांसफर कर दिया गया। ऐसे-ऐसे लोग भी आए जो कलक्टर को चुटकियों में बुलाने की ताल ठोंकते थे लेकिन मैनेजमेंट ने उनका भी सारा नशा उतार दिया। कभी भास्कर में भी ऐसी स्थितियां हो गई थी तब मैने भोपाल हेड आफिस तक मय प्रमाणों के रिपोर्ट दी जिसका परिणाम यह हुआ कि वहां से मैनेजमेंट इनक्वायरी के लिए यहां आ गए और उन्होंने यहां बहुत-कुछ बदल दिया। इसके बाद वहां से मैनेजमेंट श्री सुधीर अग्रवाल का एक पत्र मुझे मिला जिसमें उन्होंने लिखा था कि आभारी, आप यूं ही हमारा मार्गदर्शन करते रहें।
जहां भी मेनेजमेंट अपनी आंख से अपने कर्मचारियों को नहीं देखता वहां अपने पद का दुरूपयोग करने वाले आबाद रहते हैं। नवज्योति में यह खूब हुआ।राजस्थान पत्रिका को भी पुनः गौर करने की जरूरत है और नवज्योति मेनेजमेंट को भी थोडी निगाह रखने की जरूरत है क्योंकि कई बार बाहरी लोग अखबार को अपने लिए टेम्पलेट के रूप में यूज कर रहे हैं।
देवनानी और जलदाय विभाग
राजस्थान में पेट्रोल-डीजल के दाम घटे
राजस्थान में पेट्रोल-डीजल के दाम कम हो गए हैं। गुरुवार को तेल कंपनियों ने नई रेट लिस्ट जारी की है, जिसमें राजस्थान में पेट्रोल और डीजल के दाम कम होने की जानकारी दी गई है। संचार माध्यमों के अनुसार राजस्थान में पेट्रोल 16 पैसे घटकर 108.21 रुपये और डीजल 14 पैसे घटकर 93.48 रुपये प्रति लीटर हो गया है।
आपको बतादें कि प्रदेश में 2 जनवरी को भी राजस्थान में पेट्रोल के दाम 108.21 रुपये प्रति लीटर थे। उसके बाद 3, 4 और 5 जनवरी के पेट्रोल के दाम कम हुए। लेकिन 6 जनवरी को ये बढ़कर 108.52 रुपये प्रति लीटर पैसे हो गए। वहीं इसी तरह अगले तीन दिन फिर पेट्रोल के दाम में गिरावट दर्ज की गई। लेकिन 10 जनवरी को दाम बढ़कर 108.37 रुपये प्रति लीटर हो गए और आज 11 जनवरी को पेट्रोल के दाम 16 पैसे घटकर 108.21 रुपये प्रति लीटर हो गए हैं।
संत और सरकार में दरारचार, पीठों के शंकराचार्य नहीं जाएंगे संत रूष्ट, विवाद-दर-विवाद
अयोध्या में भगवान श्रीराम के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में सरकार के दखल के खिलाफ संत समाज में विवाद बढता जा रहा है। चार पीठों के शंकराचार्यों ने वहां जाने से इन्कार कर दिया है। उसके साथ उनके अनुयायियों ने भी। इधर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने यह कह कर इस विवाद की आग में घी डाल दिया कि मंदिर शैव शाक्त और संन्यासियों का नहीं है। यह रामानन्द सम्प्रदाय का है। इस पर इलाहाबाद के विद्वान शशिकांत ने उल्टा चंपत राय को निशाने पर ले लिया कि यदि मंदिर रामानन्द सम्प्रदाय का है तो संघ यहां क्या कर रहा है। चंपत राय सनातन धर्म को बांटने का काम न करें। यहां चंपत राय भूल रहे हैं कि संत हर मंदिर की शोभा हैं। उनके बिना मंदिर, मंदिर ही नहीं लगता।चंपत राय ने यह जो कह दिया यह उनका ओछापन है क्योंकि इन शंकराचार्यों ने तो कभी ऐसा नहीं कहा कि वे जिस अमुक मठ के हैं वह सिर्फ उसी सम्प्रदाय विशेष का है। लेकिन यह दोष अकेले चंपत राय का नहीं है, सत्ताई ताकत का स्पर्श पाते ही अच्छे-अच्छों के सुर बदल जाते हैं। चंपत राय के भी बदल गए।
अस्तु संतों में इस महोत्सव को राजनीतिक अखाड़ा बनाए जाने से नाराज़गी है, साथ ही यह भी कि इसमें सरकार बेजा दखल कर रही है। इसके अलावा सभी शंकराचार्य इस प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव को धर्म विधान के अनुरूप भी नहीं मान रहे। इन सब की नाराजगियों की खबरें दिल्ली और यूपी के अनेक अखबारों में पिछले दस-पंद्रह दिनों से प्रकाशित हो रही हैं।
रामायण में उल्लेखित है कि राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले भगवान शिव की पूजा की थी और सपत्नीक की थी। उस पूजा की पूर्णता के लिए रावण खुद सीता को लेकर आया था। रावण चूंकि प्रकांड पंडित था और वह यह जानता था कि बगैर सीता की मौजूदगी के राम की शिव पूजा सार्थक नहीं होगी। उसने पूजा को खंडित नहीं होने दिया और सीता को लेकर आ गया। ऐसे ही जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि यज्ञ किया तब उन्होंने भी वामांग में भार्या की मौजूदगी को अनिवार्य समझा और पत्नी सावित्री के न आ पाने पर गायत्री को पत्नी का दर्जा देकर यज्ञ को सार्थकता प्रदान की। अब अयोध्या में भगवान श्री राम का प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में पीएम मोदी को लेकर यह भी विवाद है। नाराज़ संत इसे शास्त्र सम्मत नहीं मानते। जो संत कह रहे हैं वह हम आप सब भी मानते हैं लेकिन यहां चुप हैं।
पूजा किसी भी किस्म की हो, बग़ैर वामांग के न पूर्ण होती है न ही यथेष्ट मानी जाती है। पूजा शब्द ही स्त्री वाचक है फलतः बग़ैर भार्या के किसी भी किस्म की पूजा कोई मायने नहीं रखती। अब ऐसे में देश के अनेक सिद्ध पुरुषों ने भगवान श्रीराम के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में अयोध्या जाने से इन्कार कर दिया है। गोवर्धन पुरी पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती, पश्चिमाम्नाय द्वारका शारदा पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती, जगतगुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और श्रृंगेरी शारदा पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ तथा इनके साथ इनके अनुयायी भी नहीं जाएंगे।
यहां सबसे विचित्र बात यह है कि संतों को अयोध्या में श्रीराम मंदिर के दर्शन के लिए सरकार से इजाजत लेनी होगी। जिस दिन मोदी वहां पर हैं उस दिन संतों का प्रवेश निषेध है। संत लोग दूसरे दिन दर्शन करने जा सकते हैं।
स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने तो पहले ही कडे शब्दों में कह दिया था कि मै वहां क्या तालियां बजाने जाऊं। यहां मंदिर नहीं मकबरा बन रहा है। उन्होंने स्पष्टतः कहा कि शंकराचार्य का पद राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से नीचे नहीं होता जो एक दिन बाद हमें मंदिर में दर्शन करने का आदेश दिया। हमारा स्थान पृथ्वी पर सबसे ऊंचा है। अपने पद की गरिमा और महिमा बनाए रखने के लिए हम वहां नहीं जाएंगे। हमें श्रीराम से परहेज़ नहीं है अपितु कुटिल नेताओं की राजनीति से परहेज़ है। शारदा पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि मंदिर चूंकि पूर्णतः बना ही नहीं ऐसे में प्राण-प्रतिष्ठा का कोई औचित्य नहीं। वैसे भी पौष मास में यह कार्य उचित नहीं। यह सब राजनीति से प्रेरित है क्योंकि राम नवमी जब आएगी तब तक लोक-सभा चुनावों के कारण आचार संहिता लागू हो जाएगी जिसके कारण भाजपा को इसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। इसीलिए भाजपा यह करवा रही है।
जगतगुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भी नहीं जाएंगे। उन्होंने तो और कठोर स्वर में कह दिया कि वेदों में यह कार्य संतों की जगह किसी दूसरे से कराया जाना वर्जित है। फिर भी सरकार धर्म विरुद्ध आचरण कर रही है। उधर श्रृंगेरी शारदा पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ ने भी इन्कार कर दिया। उनका भी यही कहना है कि निर्माणाधीन मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा पूर्णतः अधर्म आचरण है। उन्होंने कटाक्ष किया कि क्या इसी दिन को देखने के लिए स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने अदालत में राम मंदिर यहीं होने के प्रमाण प्रस्तुत किए थे, क्या इसी दिन के लिए निश्चलानंद सरस्वती ने 20-25 साल तक अदालत में यह लडाई लडी थी ॽ
कुल मिलाकर इस प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव को लेकर साधु समाज में मनमुटाव है। कुछ सरकार के साथ चल हैं और कुछ वे जो अपने सिद्धांतों पर अडिग हैं। इधर जाने-माने कवि कुमार विश्वास ने भी चुटकी लेते हुए कह दिया कि यह प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव राजनीति के अलावा कुछ नहीं।
अब दूसरी बात, सरकार हो या राजा, किसी भी मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा किसी पंडित के माध्यम से करवाता है, ख़ुद नहीं करता। सम्राट अशोक ने भी देश में सैकड़ों मंदिर बनवाए थे, उसने भी मंदिरों में मूर्ति स्थापना किसी पुरोहित द्वारा ही करवाई थी, खुद नहीं की।अब यहां पीएम खुद कर रहे हैं तो यह शास्त्र सम्मत नहीं है, संत लोग यही कह रहे हैं। इसके अलावा जिसने जीवन में साधुत्व अंगीकार कर लिया है, वह अकेला पूजा करने का अधिकारी है लेकिन जो सांसारिक जीवन जी रहा है वह ईश्वर की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करे, यह श्रेष्ठ नहीं है। यह दंभ है जो अमूमन हर इन्सान करता है और वही गलती यहां हो रही है। इन्ही वजहों का उल्लेख करते हुए इन ज्ञानी साधुओं ने इस प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में शामिल होने से इन्कार कर दिया। अब एक सच यह भी कि जो साधु हैं लेकिन इस प्रतिष्ठा महोत्सव में शामिल हो रहे हैं वे सिर्फ पीएम मोदी को खुश करने के लिए हो रहे हैं। यह साधुत्व भाव नहीं बल्कि स्वार्थ भाव है जो एक ” साधु ” में नहीं होता। अब बचे नेता लोग, तो वे पक्ष के हों या विपक्ष के, पीएम के लिए आयेंगे ही लेकिन यथार्थ यही है कि यह आयोजन धर्म विधान के अनुरूप होता तो श्रेष्ठ होता। (This article popular in social media is by Ashok Sharma )
प्रदेश में बिजली संकट को लेकर बोले सीएम भजन लाल शर्मा
वर्तमान में प्रदेश बिजली कम्पनियों पर लगभग 90 हजार करोड़ रुपए का ऋण है और बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस ऋण को चुकाने में जा रहा है, जबकि राज्य के पास अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में अकूत प्राकृतिक सम्पदा है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने आमजन को सस्ती दर पर और सुचारू रूप से बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने और रबी की फसल को देखते हुए किसानों को निर्बाध बिजली आपूर्ति का निर्देश दिया।
मुख्यमंत्री ने ऊर्जा विभाग को सभी विद्युत उत्पादक इकाइयों के प्रभावी संचालन और बिजली वितरण सुचारू रूप से करने का निर्देश देते हुए कहा कि इकाइयों के रखरखाव व संचालन में कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

भजनलाल शर्मा
मुख्यमंत्री, राजस्थान
रेरा के संरक्षण में बिल्डरों की जबरदस्त लूटपाटधड़ल्ले से बिल्डरों द्वारा करोड़ो की आयकर चोरी
भारत सरकार ने बिल्डर और भूमाफिया की लूटपाट से बचाने के लिए 2016 में रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) एक्ट लागू किया ताकि रेरा की देखरेख में मकान और भूखण्डधारियो के हितों का संरक्षण हो सके ।
खेद की बात है कि लूटपाट रोकने की जिम्मेदारी निभाने वाली रेरा ऑथरिटी आज खुद लूट का बहुत बड़ा अड्डा बनकर रह गई है । नतीजतन रेरा के संरक्षण में बिल्डर मकान की आस लगाए बैठे लोगों को निर्ममता से निचोड़ रहे है । रेरा की लापरवाही और उदासीनता के चलते बिल्डरों की मनमानी बढ़ गई है और धड़ल्ले से आवास मालिको का तो तेल निकाल ही रहे है, इसके अलावा प्रति वर्ष हजारो करोड़ रुपये का आयकर बचाकर इनकम टैक्स विभाग की आंखों में धूल झोंक रहे है ।
सेवानिवृत आईएएस और पूर्व मुख्य सचिव निहाल चन्द गोयल के जमाने मे बिल्डरों को लूटने का खूब मौका मिला । रेरा के अंतर्गत करीब 3 हजार प्रोजेक्ट पंजीकृत है । एक योजना में 300 भूखण्ड या मकान भी है तो कुल संख्या बैठती है करीब 10 लाख । बाजार में चर्चा है कि एक प्रोजेक्ट को स्वीकृत करने के लिए न्यूनतम 5 से 10 करोड़ रुपये की भेंट चढ़ानी अनिवार्य होती है । भेंट-पूजा के बाद बिल्डरों को लूटने का लाइसेंस हासिल हो जाता है ।
इस तरह रजिस्ट्रेशन और रेजीडेंसी की स्वीकृति प्रदान कर रेरा के अधिकारियों ने 2500 करोड़ रुपये दक्षिणा के रूप में वसूल लिए । उम्मीद थी कि नई रेरा अध्यक्ष वीनू गुप्ता के आने के बाद लूटपाट पर लगाम लगेगी । लेकिन हुआ उल्टा । रेरा अब लूट का पर्याय बन गया है । पैसे बटोरना ही इस प्राधिकरण का प्रमुख उद्देश्य है । उपभोक्ताओं के संरक्षण में या उनके हितों की रक्षा के प्रति रेरा की कोई रुचि नही है । वीनू गुप्ता को तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान रेरा का अध्यक्ष नियुक्त किया था ।
आज अकेले जयपुर शहर में करीब पांच सौ रेजिसेंसी या एन्कलेव विकसित हो रहे है । आगरा रोड, सिरसी, गोनेर, गांधी पथ, वाटिका, शिवदासपुरा, भांकरोटा, जयसिंहपुरा, महापुरा, महेंद्र सेज, मदाऊ, मुहाना और पत्रकार कॉलोनी के आसपास अनगिनत गेटेड टाउनशिप विकसित हो रही है । वैसे तो कई बिल्डर सक्रिय है । लेकिन सबसे ज्यादा टाउनशिप गोकुल कृपा ग्रुप की ओर से विकसित की जा रही है । जयपुर में इसके दर्जनों ऑफिस है और दो हजार से अधिक मार्केटिंग के बन्दे है । मानसरोवर मेट्रो स्टेशन के नीचे की सैकड़ो फिट सरकारी जमीन पर इस ग्रुप ने नाजायज कब्जा कर रखा है । इस ग्रुप के कर्मचारियों के अलावा किसी के वाहन खड़े करने की अनुमति नही है ।
ज्ञात हुआ है कि बिल्डरों को करीब 7 हजार रुपये प्रति वर्ग गज भूखण्ड और 2500 रुपये प्रति स्क्वायर फुट के हिसाब से फ्लैट या विला पड़ता है । भूखण्ड बेचे जा रहे है 30 से 45 हजार रुपये प्रति वर्ग गज । अर्थात 25 हजार रुपये प्रति वर्ग गज का मुनाफा । जबकि इस मुनाफे पर कोई मुनासिब आयकर नही चुकाया जाता है । मोटे तौर पर साल बिल्डरों द्वारा आयकर विभाग को 50 हजार करोड़ से भी ज्यादा का चूना लगाया जाता है ।
रेरा का मुख्य कार्य ही यह देखना है कि टाउनशिप में बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है या नही । पत्रकार कॉलोनी की रूपराज, कासली, अभिमन्यु, आरन, राज आंगन तथा किंग आदि का अवलोकन किया तो ज्ञात हुआ कि इन टाउनशिप का भगवान ही मालिक है । न सड़के पूर्ण हुई है और न ही पार्को का निर्माण किया गया है । रूपराज में तो एंट्रेंस गेट, नाली, पार्क, साफ सफाई आदि का कोई इंतजाम नही है । कर्मचारी के नाम पर एक गार्ड बैठा रखा है । सीसी टीवी कैमरे लगाना बहुत दूर की बात है । रेरा और बिल्डरों की मिलीभगत की वजह से रेजीडेंसी में निवास करने वाले बुनियादी सुविधा से वंचित है ।
REPORTED BY – Mahesh Jhalani
सात लाख बालिकाओं को डेढ़ साल बाद मिलेगी, नि:शुल्क साइकिलें
प्रदेश की राजकीय विद्यालयों में अध्ययनरत कक्षा नौवीं की छात्राओं को सरकार द्वारा दी जाने वाली नि:शुल्क साइकिलें अब डेढ़ साल बाद दी जाएंगी।
संचार माध्यमों के अनुसार शिक्षा निदेशालय के एक आदेश में जिला शिक्षा अधिकारियों को 13 जनवरी तक साइकिलें वितरण कर प्रगति रिपोर्ट निदेशालय को भेजने के लिये कहा है।
आपको बतादें कि प्रदेश में अध्ययनरत कक्षा नौवीं की छात्राओं को नि:शुल्क साइकिलें देने की योजना लागू है। लेकिन डेढ़ साल से छात्राओं को साइकिलें वितरण नहीं की गई थी। लम्बे इंतजार के बाद अब इसी सप्ताह करीब सात लाख छात्राओं को साइकिल का वितरण किया जायेगा। शिक्षा निदेशालय के एक आदेश में कहा गया है कि जिन जिलों में साइकिलें असेम्बल हो चुकी हैं, वहां साइकिलों का वितरण शुरू कर दिया जाए। ये साइकिलें नौंवीं और दसवीं की छात्राओं को दी जायेगी। क्योंकि पिछले सत्र में कक्षा नौंवीं की छात्राओं को साइकिलें वितरण नहीं की गई थी। इसलिए इस बार शिक्षा सत्र 2022-23 की छात्राओं जो अब दसवीं कक्षा में अध्ययनरत हैं, उनको भी साइकिलें दी जाएंगी।
साथ ही मौजूदा शिक्षा सत्र 2023-24 में कक्षा नौंवीं में अध्ययनरत बालिकाओं को भी साइकिलों का वितरण किया जाएगा। पिछले शिक्षा सत्र में कक्षा नौवीं की प्रदेश भर में करीब साढ़े तीन लाख छात्राएं थी, जो अब दसवीं में आ चुकी हैं। नौवीं में भी छात्राओं का नामांकन साढ़े तीन लाख से अधिक हुआ है। इस तरह प्रदेश भर में करीब सात लाख बालिकाओं को साइकिलें वितरित की जाएंगी।
प्रदेश में सभी प्रतियोगी परीक्षाएं निःशुल्क होनी चाहिए
सरकारें देश की हो या फिर प्रदेश की ये सभी सरकारें आमजन को विश्वास में लेने और खुश करने के लिये रेवड़ियां बांटती है। लेकिन सरकार का ध्यान बेरोजगार युवाओं की ओर नहीं जाता। सरकार मुफ्त राशन, भोजन और सब्सिडी की व्यवस्था कर सकती है तो फीस में छूट से परहेज क्यों?
बेरोजगार युवाओं की समस्या को समझने का भाव रखने वाले पत्रकार महेश झालानी ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को एक पत्र के माध्यम से सुझााव दिया है। पत्र में मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित किया कि कोई भी निगम, बोर्ड, आयोग और राज्य सरकार का कोई भी विभाग बेरोजगार युवाओं से प्रतियोगिता शुल्क के नाम पर किसी भी प्रकार की धनराशि न ले। यानी सभी प्रतियोगी परीक्षाएं निःशुल्क होनी चाहिए। श्री झालानी ने कहा कि जो युवा पहले से ही बेरोजगार है वह प्रतियोगी परीक्षा की फीस के लिए पैसे कहां से लाएगा? जब उनके पास आय का कोई साधन नहीं है तो फीस का इंतजाम कैसे होगा? कई बार कई प्रतिभाशाली युवा फीस के अभाव में परीक्षा से वंचित रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि योग्य होने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिल पाती है। परिवार वालों के पूछने पर रोजाना परेशानी होती है और इस कारण कई युवा आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं। उन्होने कहा जब सरकार मुफ्त राशन, भोजन और सब्सिडी की व्यवस्था कर सकती है तो फीस में छूट से परहेज क्यों? श्री झालानी ने मुख्यमंत्री से आशा व्यक्त करते हुए कहा कि आप मेरे उपरोक्त सुझाव पर अवश्य विचार करेंगे और इसे तत्काल लागू करने की घोषणा करेंगे। इससे सरकार की वाहवाही तो होगी ही, इसके अलावा लाखों बेरोजगारों को भी फायदा होगा।
यहां मेरा भी व्यक्तिगत विचार है कि यदि सरकार उपरोक्त विषय पर गहनता से विचार कर घोषण करती है तो निश्चित रूप से सरकार का बहुत बड़ा कदम होगा। और राजस्थान देश का पहला वो राज्य होगा जिसने बेरोजगार युवाओं के लिये इतनी बड़ी घोषण की।
राजस्थान में प्रधानमंत्री ने जारी की 5 साल के लिये आचार संहिता
यह पहला मौका है जब कोई प्रधानमंत्री ने प्रदेश में तीन दिन गुजारे। अपने तीन दिन प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रदेश के लिये एक आचार संहिता जारी कि है। अब प्रदेश में मोदी द्वारा जारी की गई आचार संहिता के तहत कार्य होगा। संहिता के अनुसार अब सरकार में पूर्व की तरह कोई भी विधायक क्षेत्रीय मुख्यमंत्री नहीं होगा, विधायक खुद काम करेंगे अपने दायरे और अपने अधिकार के तहत। कलेक्टर और एसपी से लेकर थानेदारों तक की पोस्टिंग में विधायक नहीं करेंगे कोई दखल। क्योंकि अब तक सरकारों में कलेक्टर — एसपी से लेकर पटवारी और अधिकारी से लेकर चपरासी तक की पोस्टिंग होती थी क्षेत्रीय विधायक की सिफारिश पर। ऐसे में प्रधानमंत्री का मानना है कि इन सारे काम में भ्रष्टाचार की भी रहती थी शिकायतें। संकेत यह भी है कि अब गुजरात की तरह राजस्थान में भी डिजायर की रिवाज खत्म हो सकती है। वहीं कोई भी सांसद या विधायक फील्ड में सरकारी अफसरों से नहीं करेगा अपमानजनक और धमकीभरा व्यवहार। भाजपा की मूल शालीन और सभ्य संस्कृति के अनुरूप निर्वाचित जनप्रतिनिधि करेंगे व्यवहार। अचार संहिता के अनुसार अब राजस्थान में नहीं होगा ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ वहीं इनकम टैक्स और ED से डरी हुई ब्यूरोक्रेसी को पहुंचाई राहत। प्रधानमंत्री ने कहा ‘मेरी जानकारी में आया है विधायकों का गैर जिम्मेदार रवैया। विधायक बोलते हैं अफसरों और डॉक्टर्स को अपशब्द, सभी विधायक आमजन और सरकारी कर्मचारियों के साथ करें सौम्य व्यवहार। प्रधानमंत्री के ऐसे बचनों से राजस्थान ब्यूरोक्रेसी हुई गदगद। हालांकि उन्होने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में जीरो टोलरेंस की पॉलिसी जारी रहेगी और भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों पर सरकार कठोर और त्वरित कार्रवाई करेगी। ऐसे में गहलोत खेमे के अफसर भी प्रधानमंत्री की इस घोषणा से हुए सकारात्मक। अपनी राजनीतिक निष्ठाओं को छोड़कर अब ब्यूरोक्रेसी का पूरा फोकस रहेगा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के एजेंडे पर। संहिता के अनुसार पीएमओ स्तर पर भी सरकार के कामकाज की निरंतर होगी रिमोट मॉनिटरिंग। केन्द्रीय योजनाओं की सफल मॉनिटरिंग के लिए रहेगी खास नजर।
ज्ञान के देवताओं का मानना है कि यदि प्रधानमंत्री द्वारा घोषित अचार संहिता को कठौरता से अमल लाया जाता है और प्रशासन के रोजमर्रा के कामों में सांसदों-विधायकों का दखल ना रहा तो नौकरशाही अपेक्षाकृत ज्यादा शक्तिशाली होग। ऐसे में प्रधानमंत्री के उपरोक्त वचनों से पूरी तरह बदल जाएगा राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी का पूरा चेहरा और एक नई राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति आ जाएगी अगले 100 दिनों में।
महाकुंभ मेला 2025 की तैयारी शुरू, मेले में 794 रुपये होंगे खर्च
विश्व के सबसे बड़े महाकुंभ मेला 2025 की तैयारी शुरू हो गई है। यूपी सरकार इस मेले को खास बनाने के लिये 794 करोड़ रुपये खर्च करेगी। ये राशि सडक़ें, नालियां, बिजली, ओवरब्रिज, धार्मिक स्थलों, कलाकृतियों जैसे विशेष कार्यो पर खर्च की जायेगी।
प्रयागराज महाकुंभ मेला 2025 की शीर्ष समिति के अध्यक्ष दुर्गा शंकर मिश्र के अनुसार महाकुंभ के तहत होने वाले सभी निर्माण स्थायी प्रकृति के होंगे। उनका मानना है कि उक्त होने वाले कार्य आगे भी जनता के लिये लाभ दायक होंगे। 794 करोड़ रुपये की मंजूरी 61 परियोजनाओ के रूप में मिली है। ये परियोजना यूपी सरकार के लोक निर्माण विभाग, यूपी जल निगम, गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई, नगर निगम प्रयागराज, पीडीए, पर्यटन विभाग और प्रयागराज मेला प्राधीकरण की की हैं। माना जा रहा है कि इस बार महाकुंभ मेला 2025 दिव्य और भव्य रूप से मनाया जायेगा। यह भी माना जा रहा है कि इन योजनाओं का पूरा होने के बाद प्रयागराज का नजारा ही कुछ अलग होगा।
सीएम भजनलाल शर्मा के अर्जुन होंगे जेपी गुप्तागुजरात के आईएएस की राजस्थान में प्रतिनियुक्ति
महेश झालानी
राजस्थान के प्रशासनिक ढांचे को संचालित करने के लिए भजनलाल शर्मा की सरकार अधिकारी भी पड़ोसी राज्यो से आयात करने जा रही है । इसी कड़ी में पहला नाम गुजरात मे अतिरिक्त मुख्य सचिव (वित्त) पद पर तैनात जेपी गुप्ता का है । इन्हें राजस्थान लाने की प्रक्रिया प्रारम्भ होगई है और इसी महीने में मुख्यमंत्री के एसीएस पद पर जॉइन करने की सम्भवना है । हो सकता है कि इन्हें एसीएस (वित्त) का पद दिया जाए ।
जैसा कि ज्ञात होगा कि राजस्थान की नौकरशाही पर नियंत्रण दिल्ली से रहेगा । यानी बड़े पदों पर नियुक्ति और स्थानांतरण पीएमओ स्तर से होगा ताकि नौकरशाही के मोर्चे पर भजनलाल सरकार को मात नही खानी पडे । इसलिए दिल्ली द्वारा ईमानदार और रिजल्ट ऑरिएंट्एड अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने की मशक्कत की जा रही है । पिछले दो ढाई माह में केवल पांच-छह नियुक्तियां ही हुई है । दिल्ली से सूची तैयार होने के बाद व्यापक स्तर पर हर क्षेत्र में तबादले होंगे । उम्मीद है कि 15 जनवरी के आसपास होने की संभावना है ।
दौसा जिला अंतर्गत राहावास गांव के मूल निवासी जेपी गुप्ता का राजस्थान लगभग तय हो चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुप्ता की प्रतिनियुक्ति की पत्रावली को हरी झंडी दे दी है । गुजरात मे 10 से 12 जनवरी तक “गुजरात वेरीबरेंट” का भव्य स्तर पर आयोजन किया जा रहा है ।
इस समारोह के बाद मल मास की समाप्ति पर जेपी गुप्ता कभी भी जयपुर आ सकते है ।
प्रधानमंत्री के अति विश्वसनीय अधिकारी जेपी गुप्ता को योग्य प्रशासनिक, ईमानदार और त्वरित निर्णय लेने वाले अधिकारी माने जाते है । जोधपुर से एमटेक करने वाले जेपी गुप्ता का जन्म 1 जुलाई, 1965 को एक साधारण खण्डेलवाल परिवार में हुआ है । विद्यार्थी जीवन से ही ये बहुत प्रतिभाशाली छात्र रहे है । वर्तमान मुख्य सचिव सुधांश पन्त और जेपी गुप्ता एक ही बैच (1991) के है ।
दिल्ली ने पहले से मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और सीएम के प्रमुख सचिव तय कर लिए थे । तभी तो टी.रविकांत को स्थायी तौर पर सीएम का प्रमुख सचिव नियुक्त नही किया गया है । जाहिर है कि टी. रविकांत के स्थान पर जेपी गुप्ता को मुख्यमंत्री का अतिरिक्त मुख्य सचिव तैनात किया जाना सुनिश्चित है । ऐसे में टी.रविकांत को अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने की संभावना है ।
गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव जेपी गुप्ता से कल राजस्थान आने को लेकर विस्तार से बात हुई । उन्होंने किसी भी तरह के पत्ते खोलने से इनकार कर दिया । उन्होंने यह भी बताने से मना किया कि वे राजस्थान में किस हैसियत से कार्य करेंगे । उनका कहना था कि ड्यूटी को अंजाम देना उनकी प्राथमिकता है । जो भी निर्देश और जिम्मेदारी मिलेगी, बखूबी निभाउंगा । उन्होंने कहाकि फिलहाल वे गुजरात वाइब्रेंट में व्यस्त है । ऐसे में क्या प्रशासनिक गतिविधियां हो रही है, उन्हें नही पता ।
यह तयशुदा है कि पन्त और गुप्त की जोड़ी निश्चित रूप से राजस्थान की सड़ी-गली, भ्रस्टाचार में डूबी हुई और अलसाई हुई नौकरशाही में नई जान फूंकने का कार्य करेगी । पन्त और गुप्ता में अच्छी बॉन्डिंग है जिसका लाभ प्रदेश की जनता को मिलना सुनिश्चित है । गुप्ता की आर्थिक मामलों में गहरी पकड़ है । ऐसे में प्रदेश में भारी निवेश भी होगा और कर्जे में डूबी सरकार को इससे कुछ हद तक मुक्ति मिलने की संभावना है ।
मोदी अपनी स्टाइल से काम करते है । तभी तो उन्होंने एक ही झटके में पुलिस महानिदेशक उमेश मिश्रा को वीआरएस लेने के लिए बाध्य कर दिया । उत्कल रंजन साहू को भी अभी तक डीजीपी नही नियुक्त किया गया है । इन्हें होमगार्ड डीजी के अलावा डीजीपी का केवल चार्ज दिया गया है । हो सकता है कि प्रदेश में डीजीपी भी कहीं से आयात किया जाए । वैसे इसकी उम्मीद कम है । साहू छह महीने तो गाड़ी खेंच ही सकते है ।
राजस्थान में यह दूसरा अवसर होगा जब किसी आईएएस को आयात करके मुख्यमंत्री का सचिव बनाया जा रहा हो । इससे पहले वसुंधरा के पहले कार्यकाल में सिक्किम कैडर के आईएएस गोविंद मोहन सीएम के सचिव रहे है । दूसरे सचिव होंगे जेपी गुप्ता । कुछ और अधिकारी दिल्ली से आ सकते है ।



